Modi Amit Shah Rahul Gandhi

कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस वक्त पूरे देश में गुजरात लॉबी का आतंक छाया हुआ है. हालांकि यह दिखाई भी दे रहा है. कहीं पर विधायक तोड़े जा रहे हैं, कहीं पर पार्टी को तोड़ने की कोशिश हो रही है तो कहीं पर दूसरी पार्टियों की सरकारों को राज्यों से हटाने की कोशिश हो रही है और कहीं हटा भी दिया गया है साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल करके. कर्नाटक से लेकर मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र इसका उदाहरण है. नीतीश कुमार की पार्टी को भी तोड़ने का प्रयास हुआ.

गुजरात लॉबी जिस रास्ते पर तेजी से दौड़ रही है उसमें वह तमाम क्षेत्रीय पार्टियों को नेस्तनाबूद करने पर आमादा है. दूसरी तरफ कांग्रेस को भी खत्म कर देना चाहती है. दूसरे शब्दों में कहें तो एक तरफ गुजरात लॉबी क्षेत्रीय दल मुक्त भारत तो दूसरी तरफ कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने के लिए तमाम दांवपेच आजमाने से पीछे नहीं हट रही है. इसको सीधे शब्दों में कहें तो विपक्ष मुक्त भारत के सपने को साकार करने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं. ऐसी परिस्थिति में देश में सिर्फ एक पार्टी बचती है और वह है बीजेपी और बीजेपी की कमान इस वक्त नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथों में है.

सड़क से लेकर संसद तक तमाम जानकारों का यही मानना है कि इस वक्त पूरा देश बीजेपी के कब्जे में है और बीजेपी मोदी और अमित शाह के. लेकिन कई लोगों का मानना है कि ऐसा है नहीं. अगर राजनीतिक रूप से और लोकतांत्रिक तरीके से देखा जाए तो बीजेपी केंद्र में तो है लेकिन राज्यों में उसने अपनी जो पकड़ मजबूत की है वह साम-दाम-दंड-भेद इस्तेमाल करके की है. जहां उसकी सरकार नहीं थी वहां गिरा कर खुद की सरकार बना ली. विधायक तोडे गए, पार्टी तोड़ी गई सब कुछ किया और सरकार बनाई.

यह घटनाएं देखकर इस बात का एहसास होता है कि मोदी और शाह को इस बात का अंदाजा है कि अगर लंबे वक्त तक राष्ट्रीय स्तर पर अपना कब्जा बनाए रखना है हुकूमत बनाए रखनी है तो कांग्रेस को कमजोर करना होगा कांग्रेस को नेस्तनाबूद करना होगा. इसीलिए संसद से लेकर रैलियों तक मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात कही. इस नारे के पीछे यही वजह थी कि जो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है उसके फुटप्रिंट पूरे देश में हैं, उसको पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए.

बीजेपी के तथाकथित चाणक्य अमित शाह ने इसी रणनीति के तहत कांग्रेस के नेताओं की घेराबंदी शुरू की और उन नेताओं पर हाथ रखना शुरू किया जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप थे या फिर ईडी सीबीआई के द्वारा उन्हें डराया जा सकता था. इसके अलावा उन नेताओं पर भी हाथ रखा गया जिन्हें राज्यसभा नहीं दी गई या फिर जो लोग राहुल गांधी के फैसलों से नाखुश थे, उन्हें लग रहा था कि अब कांग्रेस में उन्हें बिना काम के तवज्जो नहीं दी जाएगी, बिना मेहनत के पद नहीं दिए जाएंगे. इसी रणनीति के तहत कांग्रेस के भीतर एक G-23 का ग्रुप भी क्रिएट किया गया.

और इन्हीं बागियों के ग्रुप को अमित शाह ने दाना डालना शुरू किया और अमित शाह के शिकंजे में सबसे पहले फंसे कैप्टन अमरिंदर सिंह. कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस छोड़कर चले गए उन्होंने अपनी पार्टी बनाई बीजेपी ने सहयोग किया लेकिन मिला कुछ नहीं लेकिन कांग्रेस पंजाब में बिखर गई सरकार नहीं बना पाई. और ऐसा ही ऑपरेशन गुलाम नबी आजाद के साथ शुरू किया गया. मोदी ने तारीफों के पुल बांधे, पद्मभूषण जैसा इनाम दिया गया. गुलाम नबी आजाद तथा उनके साथ और भी कई कांग्रेस के नेता इसके बाद ऐसा लगने लगा कि बीजेपी के तरफ झुकने लगे, सॉफ्ट कॉर्नर रखने लगे. यह पूरा खेल बहुत ही बारीक था.

इस खेल को राहुल गांधी समझ गए थे?

गुजरात लॉबी कांग्रेस के अंदर जिस खेल को खेल रही थी वह बहुत बारीक था. लेकिन इस बार राहुल गांधी समझ गए थे कि क्या होने जा रहा है. दरअसल चाणक्य को उस वक्त झटका लगा जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि राहुल गांधी को अब पप्पू साबित नहीं किया जा सकता है. कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बयानों पर अगर गौर किया जाए तो कैप्टन अमरिंदर सिंह तो पार्टी छोड़ चुके हैं. गुलाम नबी आजाद भी आजाद हो चुके हैं. लेकिन मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, भूपेंद्र हुड्डा, शशि थरूर और इससे पहले कपिल सिब्बल जैसे नेता ऐसा लग रहा था, ऐसा लग रहा है कि मोदी की गोदी में बैठे हुए हैं.

मनीष तिवारी कैप्टन अमरिंदर सिंह के चेले हैं वही आनंद शर्मा आजकल गुलाम नबी आजाद की थाली में ही खाना खाते हैं ऐसा उनके बयानों से नजर आता है गुलाम नबी आजाद को राहुल गांधी ने जाने दिया. भूपेंद्र हुड्डा और उनके बेटे को कांग्रेस ने हरियाणा में फ्री हैंड दे रखा है. भूपेंद्र हुड्डा G-23 के अहम सदस्य थे और राहुल गांधी ने उनको हरियाणा में फ्री हैंड देकर जी-23 को एक तरह से नेस्तनाबूद करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया था. बीजेपी के चाणक्य कांग्रेस के ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक करना चाहते थे और जो कांग्रेस के अंदर दगे हुए कारतूस थे उन्हीं को राहुल गांधी ने चाणक्य को सौंप दिया है. दाव उल्टा पड़ता नजर आ रहा है.

कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी तो पंजाब के अंदर फ्लॉप हो गई लेकिन अब गुलाम नबी आजाद ने नई पार्टी बनाने का ऐलान किया है और सभी को मालूम है कि पार्टी चलाने के लिए फंडिंग की जरूरत होती है और यह फंडिंग में कहां से मिलेगी यह बताने की जरूरत नहीं है. परिसीमन के बाद जम्मू में बीजेपी को बहुत उम्मीद है. अगर गुलाम नबी आजाद की पार्टी तीन या चार विधायक भी बना लेती है विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी गुलाम नबी आजाद के साथ मिलकर वहां सरकार चलाना चाहती है. देखते हैं गुलाम नबी आजाद इस खेल में सफल होते हैं या उनका हश्र भी कैप्टन अमरिंदर सिंह की तरह होता है.

जहां तक बात है राहुल गांधी की तो वह कई बार कह चुके हैं कि विचारधारा की लड़ाई में बीजेपी और आरएसएस को सिर्फ कांग्रेस हरा सकती है. लेकिन इसके इतर राहुल गांधी सेंट्रल पावर और स्टेट पावर को बराबर तवज्जो देते हुए भी नजर आते हैं. एक तरफ वह राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों को आगे बढ़ाते हुए भी नजर आते हैं. चाहे वह भूपेश बघेल हो या फिर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हो या फिर गठबंधन सरकार की बात करें तो जब महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे उस वक्त भी और अब बिहार में नीतीश कुमार भी है उस वक्त भी वह इन नेताओं को आगे बढ़ाने और इनके काम में दखल न देने कि अपनी आदत से अब लोकप्रिय हो रहे हैं. वहीं गुजरात लॉबी हर चीज पर अपना कंट्रोल रखती है फ्री हैंड किसी को नहीं देती. चाहे गठबंधन सरकार हो या फिर खुद की.

राहुल गांधी किसी बड़ी रणनीति पर काम कर रहे हैं?

अब बात आती है 2024 के लोकसभा चुनावों की. राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकल रहे हैं और 2024 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी को खारिज करके कोई भी क्षेत्रीय दल नहीं लड़ सकता. ममता बनर्जी से लेकर केजरीवाल तक और नीतीश कुमार तक का नाम उछल रहा है प्रधानमंत्री पद के लिए, लेकिन राहुल गांधी को खारिज करके मोदी को हराने का सपना कोई भी राजनीतिक दल नहीं देख सकता. लेकिन क्या राहुल गांधी फिर से कांग्रेस को खड़ा करके खुद के दम पर मोदी को चुनौती देते हुए नजर आएंगे और कांग्रेस को सत्ता में लाने की कोशिश करेंगे या फिर पूरे देश में अपने काडर को खड़ा करके 150-170 सीटों पर कांग्रेस को मजबूती से लड़ाएंगे और बाकी क्षेत्रीय दलों के लिए छोड़ देंगे?

जहां कांग्रेस जीत सकती है उन्हीं सीटों पर राहुल गांधी फोकस करेंगे या फिर या फिर किसी क्षेत्रीय दल के नेता को आगे कर देंगे? नीतीश कुमार का नाम उछाला जा रहा है मीडिया की तरफ से भी और उनकी पार्टी की तरफ से भी लेकिन नीतीश कुमार क्या ममता बनर्जी और केजरीवाल को मना पाएंगे? और अगर राहुल गांधी ने ठान ली, जैसा कि पहले भी देखा गया है, अगर राहुल गांधी चाणक्य की रणनीति को ध्वस्त कर सकते हैं तो 2024 में मोदी को सत्ता से बेदखल करने के लिए थोड़ा सा भी खेल कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने कर दिया तो गुजरात लॉबी के मंसूबों पर पानी फिर जाएगा. बिहार में अगर सरकार चल रही है नीतीश कुमार के नेतृत्व में तो वह राहुल गांधी की सहमति से ही चल रही है. तो क्या यह खेल कांग्रेस करेगी 2024 में?

कई लोग कहते हैं कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे और बिल्कुल बनना भी चाहिए. लेकिन राहुल गांधी के पिछले रिकॉर्ड को अगर देखा जाए तो जहां आज लोग प्रधानमंत्री बने रहने के लिए या फिर बनने के लिए तमाम मीडिया खरीद रहे हैं, विज्ञापनों पर करोड़ों अरबों रुपए खर्च कर रहे हैं, उस प्रधानमंत्री पद को राहुल गांधी 2009 में ठुकरा चुके हैं. 2004 के बाद जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी थी उनके मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर चुके हैं, यह कहते हुए कि अगर मैं मंत्री बन गया केंद्र सरकार में तो सत्ता के दो केंद्र बन जाएंगे और यह ठीक नहीं. तो क्या राहुल गांधी 2024 में भी प्रधानमंत्री का पद ठुकरा सकते हैं?

राहुल गांधी के पिछले रिकॉर्ड को अगर देखा जाए और तमाम राजनीतिक जानकारों की मानी जाए तो राहुल गांधी इशारा दे चुके हैं कि अगर माहौल दिखा तो वह नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री का कैंडिडेट बनाने से पीछे नहीं हटेंगे. क्या 2024 में राहुल गांधी चाणक्य के मंसूबों को पूरी तरीके से ध्वस्त करने के लिए कुछ भी कर गुजर जाने के लिए तैयार हैं? अभी उनकी तैयारियों से और फैसलों से तो यही लग रहा है. नीतीश कुमार अपने नाम पर तमाम क्षेत्रीय दलों को मना लेते हैं तो क्या राहुल उनके नाम पर सहमति दे देंगे? अगर ऐसा होता है तो यह बात एक बार फिर से साबित हो जाएगी कि राहुल गांधी का दिल बहुत बड़ा है. गुजरात लॉबी से काफी बड़ा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here