Rahul Gnadhi 2024

तमाम राजनीतिक विश्लेषक और बड़े-बड़े मीडिया समूह के पत्रकार राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के बारे में एक ही राय रखते थे कि वह पार्ट टाइम पॉलीटिशियन है. लेकिन राहुल गांधी ने उनकी बातों को कहीं ना कहीं पिछले कुछ महीनों में गलत साबित कर दिया है. कन्याकुमारी से भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी को लेकर यह तो पक्का हो गया है कि कश्मीर में वह झंडा फहराएंगे. लेकिन कांग्रेस की तरफ से भी यह साफ कर दिया है कि यह सब लाल चौक पर नहीं होगा.

कांग्रेस की तरफ से लाल चौक पर झंडा फहराने को आर एस एस का एजेंडा बताया गया है. लाल चौक मिशन वाली सूची में प्रधानमंत्री मोदी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज से लेकर अनुराग ठाकुर तक का नाम दर्ज है और सबसे बड़ी वजह यही है कि राहुल गांधी लाल चौक पर झंडा फहराने से परहेज कर रहे हैं.

वैसे राहुल गांधी की नजर से देखा जाए तो संघ और बीजेपी के खिलाफ वह भारत जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं. वह काम करने का क्या मतलब है जो उनके राजनीतिक विरोधी कर चुके हैं या आने वाले दिनों में करने वाले हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की छवि इस यात्रा से पूरी तरीके से बदल चुकी है.

राहुल गांधी ने लाल किले से भी भाषण दिया था. राहुल गांधी के लाल किले से भाषण दिलाने के पीछे कांग्रेस के रणनीतिकारों को अपने नेता को प्रधानमंत्री मोदी के बराबर खड़ा करने की कोशिश मानी जा रही है, ताकि लोग राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत महसूस कर सकें.

राहुल गांधी ने सिर्फ इतना कहा था कि वह श्रीनगर पहुंचकर झंडा लहराएंगे. लेकिन एक दिन उनके ही एक करीबी कांग्रेस नेता ने लाल चौक पर झंडा फहराने की बात बोल दी और बाद में जब राहुल गांधी के लाल चौक पर झंडा फहराने की चर्चा जोर पकड़ने लगी तो कांग्रेस की तरफ से सफाई देनी पड़ी कि राहुल गांधी लाल चौक पर झंडा नहीं फहराएंगे क्योंकि वह एजेंडा कांग्रेस का नहीं बल्कि आरएसएस का है.

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इससे समझ में आता है कि राहुल गांधी लगातार आरएसएस का विरोध जारी रखना चाहते हैं. इस वक्त देखा जाए तो राहुल गांधी इस देश के इकलौते राजनेता है जो हर कीमत पर विचारधारा की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं और उससे एक कदम भी पीछे नहीं हटना चाहते हैं.

पिछले दो लोकसभा चुनाव से बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिल रहा है. लेकिन देखा जाए तो वोट प्रतिशत 30 और 35 के बीच रहा है और जो बीजेपी के खिलाफ वोट बैंक है वह क्षेत्रीय दलों में बटवारा करा रहा है. इसके साथ ही बीजेपी के बाद अगर किसी राजनीतिक पार्टी को सबसे अधिक वोट मिल रहा है तो वह कांग्रेस पार्टी है. राहुल गांधी संघ का विरोध हर कीमत पर जारी रखना चाहते हैं और राहुल गांधी के विरोध से इतर देखा जाए तो एक बड़ी आबादी इस देश में ऐसी है जो संघ का विरोध करती है. लेकिन इस वक्त राहुल गांधी के साथ खड़ी हुई नहीं है.

अगर संघ का विरोध करने वाली जनता राहुल गांधी के साथ खड़ी हुई हुई रहती तो इस वक्त कांग्रेस सरकार में रहती या फिर आने वाले लोकसभा चुनाव में उसे सरकार बनाने से कोई नहीं रोक सकता. उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव, दिल्ली और पंजाब में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल तथा के. चंद्रशेखर राव और दूसरे दल के नेता बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस को दरकिनार करते हुए अलग गठबंधन की बात कर रहे हैं. लेकिन क्या संघ का विरोध करने वाली इस देश की जनता कांग्रेस से अलग किसी गठबंधन को स्वीकार करेगी?

अलग-अलग राज्यों के चुनाव में एक नैरेटिव सा बनता जा रहा है कि जो भी बीजेपी को हराएगा उसे वोट मिल रहा है. दिल्ली में केजरीवाल को, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को. ठीक इसी तरह दूसरे राज्यों में जहां बीजेपी का मुकाबला क्षेत्रीय दलों से है वहां बीजेपी के खिलाफ उस क्षेत्रीय दल को जनता एकमुश्त वोट दे रही है और कांग्रेस को दरकिनार कर रही है.

लेकिन लोकसभा में बीजेपी का सीधा मुकाबला है कांग्रेस से होगा. क्योंकि क्षेत्रीय दल अपने क्षेत्र तक सीमित रहेंगे. तो क्या अगर क्षेत्रीय दल आपस में गठबंधन करते हैं तो जनता ऐसा नहीं सोचेगी कि केंद्र में अगर कोई बीजेपी को हराकर सरकार बना सकता है तो वह कांग्रेस है और ऐसा सोचते हुए संघ का विरोध करने वाली एक बड़ी आबादी 2024 में राहुल गांधी के साथ खड़ी नहीं हो सकती? कांग्रेस के साथ खड़ी नहीं हो सकती?

जिस तरह से राहुल गांधी की छवि में बदलाव हुआ है, उसको देखते हुए ऐसा भी कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक और पंजाब तथा पश्चिम बंगाल और बाकी दूसरे राज्यों तक केंद्र से बीजेपी को हटाने के लिए क्षेत्रीय दलों का समर्थन करने वाली जनता भी राहुल गांधी के साथ आ सकती है, कांग्रेस का समर्थन कर सकती है.

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