Varun Gandhi Congress

बीजेपी के विरोध के सवाल पर वरुण गांधी जितनी दूरी तय कर चुके हैं वहां से बीजेपी में रहने की गुंजाइश नजर नहीं आती है. पार्टी और सरकार पर उनके लगातार हमलों के बाद भी नेतृत्व ने खामोशी अख्तियार कर रखी है. लंबे समय से वरुण गांधी अपने बयानों से बीजेपी की सरकारों और उसके नेतृत्व को घेरते रहे हैं. वरुण के बयानों पर गौर किया जाए तो साफ मालूम पड़ता है कि बीजेपी से उनके रिश्ते अंत की ओर हैं.

कुछ दिनों पहले वरुण गांधी ने बयान दिया था कि उन्हें कांग्रेस से कोई एतराज नहीं है और पंडित नेहरू से कोई शिकायत नहीं है. इस बयान को कांग्रेस की ओर उनके बढ़ते कदमों के तौर पर देखा गया. परिवार के एकजुट होने की संभावनाएं भी दिखाई देने लगी. संकट के दौर से गुजर रही कांग्रेस पार्टी के शुभचिंतकों को वरुण के जुड़ाव से खासतौर से उत्तर प्रदेश में संजीवनी हासिल होने की गुंजाइश नजर आ रही थी.

लेकिन इसी बीच राहुल गांधी ने उनको लेकर एक और बयान दे दिया और कहा कि वरुण की विचारधारा उनसे अलग है और उनको कांग्रेस में दिक्कत होगी. राहुल के जवाब के बाद एक तरह से वरुण गांधी की कांग्रेस में शामिल होने की संभावनाओं पर विराम लग गया. देखा जाए तो वरुण को कांग्रेस में शामिल करने का फैसला लेना इतना आसान नहीं है.

वरुण गांधी उस परिवार के सदस्य हैं जिसकी राजनीतिक विरासत पर फिलहाल राहुल गांधी का कब्जा है. इसी विरासत के संघर्ष में वरुण को गोद में लिए मेनका गांधी 40 साल पहले सास इंदिरा गांधी के घर से बाहर निकली थीं. परिवार से बाहर होने के बाद राजनीति में उनके विकल्प सीमित थे. पहले उन्होंने अपनी पार्टी संजय विचार मंच बनाई, फिर जनता पार्टी और जनता दल से गुजरते हुए 2004 में वह बीजेपी में शामिल हो गईं.

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वरुण गांधी की परवरिश और कब तक का राजनीतिक सफर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस की राजनीति के विरोध के बीच बीता है. इसमें पारिवारिक गाठें भी शामिल है. वरुण को कांग्रेस में शामिल करके सोनिया राहुल उस अध्याय को क्यों खोलना चाहेंगे जो 40 साल पहले बंद हो चुका है? हालांकि अभी सूत्रों के हवाले से जानकारी यह भी आ रही है कि वरुण के लिए दरवाजे पूरी तरीके से बंद नहीं है. प्रियंका से उनकी बातचीत जारी है, शायद प्रियंका राहुल को मना लें.

हालांकि एक सच यह भी है कि बीजेपी के विरोध के सवाल पर वरुण जितनी दूरी का एक तय कर चुके हैं वहां से उनकी बीजेपी में वापसी की गुंजाइश नजर नहीं आ रही है. पार्टी और सरकार पर उनके लगातार प्रहारों के बाद भी नेतृत्व खामोश है. मेनका गांधी जिस दौर में बीजेपी से जुड़ी और फिर 2004 के चुनाव, जब वरुण पार्टी के पक्ष में प्रचार करने निकले, तब भी बीजेपी को गांधी परिवार के दूसरे खेमे की जरूरत थी. मोदी-शाह के दौर की बीजेपी से वर्णन संगत नहीं बिठा सकें.

असलियत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को वरुण गांधी ने कभी स्वीकार ही नहीं किया. दूसरी तरफ मोदी-शाह ने उन्हें दरकिनार कर आम सांसदों की सूची में शामिल कर दिया. फिर 2019 में उनकी मां मेनका गांधी को मंत्रिमंडल में ना लेकर किनारे किया. दोनों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर किया. इस बीच मेनका गांधी ने ऐलान किया है कि 2020 का चुनाव हुआ एक बार फिर सुल्तानपुर से लड़ेंगी.

वरुण गांधी के बीजेपी से दूर होने के बाद क्या मेनका बीजेपी से जुड़े रहना चाहेगीं या बीजेपी उन्हें टिकट देगी? 2004 में मेनका गांधी ने वरुण का राजनीतिक रास्ता तय किया था. 2024 के लिए यह जिम्मेदारी वरुण पर है, जब वह अपने साथ अपनी मां की भी आगे की राजनीतिक यात्रा तय करेंगे. फिलहाल राहुल गांधी ने यही कहा है कि उनकी विचारधारा दूसरी है, वरुण को यहां दिक्कत होगी.

राहुल गांधी के इस बयान पर गौर किया जाए तो बात पूरी तरह से अभी खत्म नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव में वक्त लंबा है और पिक्चर अभी बाकी है.

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