modi putin

रूस और यूक्रेन (Russia and Ukraine) की जंग अब खतरनाक होती जा रही है खबर है कि रूस ने यूक्रेन के जेपोरीजिया न्यूक्लियर पावर प्लांट पर हमला करने के बाद कब्जा कर लिया है. इसके बाद अमेरिका से लेकर यूरोप तक बड़ी हलचल पैदा हो गई है. वहीं ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की इमरजेंसी बैठक बुला ली है.

रूस के राष्ट्रपति पुतिन इन दिनों आकस्मिक झटकों को झेल रहे हैं. यूक्रेन पर हमले के बीच न्यूक्लियर अटैक की अटकलें भी तेज हो गई हैं. पुतिन हमेशा से अप्रत्याशित चाल चलने के लिए जाने जाते रहे हैं. उनकी छवि को देखते हुए कोई भी परमाणु हमले की उनकी धमकी को जरा भी लापरवाही से नहीं ले रहा है. पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं.

क्या भारत को स्टैंड न लेने की कीमत चुकानी पड़ सकती है?

इस युद्ध ने भारत को फिसलन भरी ढलान पर लाकर खड़ा कर दिया है. इससे भी बदतर भारत के दोनों पैर केले के छिलके पर हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मतदान से दूर रहकर भारत ने अपना पारंपरिक रुख अपनाया है. ऐसा लगता है प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने नियम आधारित विश्व व्यवस्था के समर्थन की अभिव्यक्ति पर व्यावहारिक वास्तविक राजनीति को चुना है.

लेकिन इसके खतरे भी हैं, इसके लिए भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है. यह भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमानेंट मेंबर की सीट के लिए समर्थन जुटाने का समय था. भारत अपनी कूटनीतिक चाल बदलकर स्थाई सदस्य बनने की योग्यता हासिल कर सकता था. लेकिन हमने अपने तीखे रवैया के सार्वजनिक प्रदर्शन के साथ उन भावनाओं को खत्म कर दिया. लेकिन इसके पीछे भी कई तरह के कारण रहे होंगे, जो राजनीति से इतर मोदी सरकार समझ रही होगी.

इन सबके बीच रूस और यूक्रेन की जंग पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है. वहीं कई देश ऐसे हैं जो भारत के रुख पर हैरानी जाहिर कर रहे हैं. वजह भारत का दोनों देशों में से किसी का भी खुलकर समर्थन न करना है. वही यूक्रेन की मदद न करने पर भारत के कुछ लोग भी प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगा रहे हैं और मित्र रूस को सही रास्ता दिखाने की बात कर रहे हैं.

एक तरफ मोदी सरकार ने यूक्रेन संकट के बीच पुतिन से फोन पर बात की और युद्ध को तत्काल खत्म करने की अपील की. वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस का यूक्रेन पर हमले के खिलाफ पेश किए गए प्रस्ताव पर वोट नहीं किया. इसके बाद से ही इस बात की चर्चाओं को बल मिल रहा है कि जब पूरा यूरोप और पश्चिमी देश रूस के खिलाफ हो चुके हैं तब भी भारत पुतिन के खिलाफ एक शब्द क्यों नहीं बोल रहा है.

असल में कुछ गंभीर वजहें हैं जो भारत के कदमों को रोक रही हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए इतिहास से सबक लेना जरूरी है. एक समय था जब अमेरिका ने भारत के बदले पाकिस्तान का समर्थन किया था और यही रूस था जिसने भारत को अटूट समर्थन दिया था. भारत के नीति निर्माता इस नहीं भूलेंगे. भारत को पड़ोसी चीन से निपटने के लिए रूस के राजनयिक समर्थन और हथियारों की ज़रूरत है.

सीमा पर भारत का संघर्ष चीन के साथ पिछले कई महीनों से चल रहा है. भारत और चीन पिछले 2 वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं. दोनों पक्षों में सैनिकों, टैंको और तोपखानों को इकट्ठा किया हुआ है. रूस वर्तमान में भारत को s-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली जैसे उपकरणों की आपूर्ति कर रहा है. जो चीन और पाकिस्तान के खिलाफ भारत के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “आत्मनिर्भर भारत” के नारे के बावजूद डिफेंस सेक्टर में भारत अभी भी सबसे अधिक रूस पर निर्भर है. इस वक्त रूस और यूक्रेन के तनाव के बीच अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और जर्मनी समेत अधिकतर देश यूक्रेन का साथ दे रहे हैं. रूस एक तरह से अलग अलग दिखाई दे रहा है. ऐसे में भारत के लिए किसका साथ दे वाली स्थिति बन सकती है. क्योंकि अगर भारत रूस के साथ गया तो अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के संबंधों पर असर पड़ सकता है और यूक्रेन के साथ गया तो रूस से रिश्ते बिगड़ सकते है.

केंद्र सरकार चाह कर भी रूस के खिलाफ नहीं जा सकती और ना ही राष्ट्रपति पुतिन की निंदा कर सकती है. भारत को दूसरे के फटे में टांग अड़ाने से पहले अपने देश के नागरिकों की चिंता है. हालांकि सरकार इस मुद्दे पर भी गंभीर हुई है लेकिन देरी से हुई है.

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