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कांग्रेस-लेफ़्ट फ़्रंट की चुनाव में गठबंधन के लिए इंडियन सेक्युलर फ़्रंट (आईएसएफ़) के साथ बातचीत चल ही रही थी कि वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने इस मामले में पार्टी को निशाने पर ले लिया है. शर्मा कांग्रेस आलाकमान से नाराज़ चल रहे बाग़ी नेताओं यानी G23 गुट के सदस्य हैं.

बीते दिनों जम्मू में हुए शांति सम्मेलन में भी शर्मा और बाक़ी नेताओं ने इशारों-इशारों में कांग्रेस आलाकमान को निशाना बनाया था. शर्मा ने सोमवार शाम को ट्वीट कर कहा, आईएसएफ़ और ऐसे अन्य दलों के साथ कांग्रेस का गठबंधन पार्टी की मूल विचारधारा, गांधीवाद और नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ़ है और ये सब बातें कांग्रेस पार्टी की आत्मा हैं. इन मुद्दों पर कांग्रेस कार्य समिति में चर्चा होनी चाहिए थी.

सांप्रदायिकता पर ज्ञान

शर्मा यहीं नहीं रुके और उन्होंने एक और ट्वीट दाग दिया. उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को सांप्रदायिकता पर ज्ञान देते हुए कहा कि सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई में कांग्रेस चयनात्मक नहीं हो सकती है और हमें सांप्रदायिकता के हर रूप से लड़ना है. 28 फ़रवरी को कांग्रेस और लेफ़्ट की कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हुई रैली में आईएसएफ़ के प्रमुख पीरजादा अब्बास सिद्दीक़ी के साथ ही पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी भी शामिल रहे थे. अधीर की इस रैली में मौजूदगी को लेकर ही शायद शर्मा ने उन पर हमला बोला और कहा कि रैली में पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष की उपस्थिति और समर्थन शर्मनाक है और उन्हें अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए.

अधीर ने दिया जवाब

इसके बाद अधीर भी मैदान में आ गए और उन्होंने आनंद शर्मा को खुलकर जवाब दिए. अधीर ने ट्विटर पर लिखा, सीपीएम के नेतृत्व वाला लेफ़्ट फ़्रंट पश्चिम बंगाल में सेक्युलर गठबंधन की अगुवाई कर रहा है और कांग्रेस इसका अहम अंग है. हम बीजेपी की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति को हराने के लिए प्रतिबद्ध हैं. अधीर ने अगले ट्वीट में आईएसएफ़ के साथ गठबंधन की स्थिति को साफ करते हुए कहा कि सीट बंटवारे में कांग्रेस को उसका पूरा हिस्सा मिला है और लेफ़्ट फ्रंट आईएसएफ़ को अपने हिस्से से सीटें दे रहा है.

बेबाक बयानी के लिए पहचाने जाने वाले अधीर ने शर्मा से कहा कि सीपीएम के नेतृत्व वाले गठबंधन को सांप्रदायिक कहकर आप सिर्फ़ बीजेपी के ध्रुवीकरण के एजेंडे का समर्थन कर रहे हैं. अधीर ने कहा कि वे लोग जो बीजेपी की ज़हरीली सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ लड़ना चाहते हैं, वे कांग्रेस के लिए पांच राज्यों में चुनाव प्रचार करें न कि बीजेपी के सुर में सुर मिलाकर पार्टी को कमज़ोर करने की कोशिश करें.

उन्होंने G23 के बड़े नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद के द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल में की गई तारीफ़ को लेकर उन्हें निशाने पर लिया और कहा कि ऐसे लोग व्यक्तिगत हित वाले मुद्दों से ऊपर उठें और प्रधानमंत्री की तारीफ़ में समय जाया न करें. जम्मू में G23 गुट के नेताओं के द्वारा शांति सम्मेलन करने के बाद से ही सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस में एक और टूट हो सकती है. G23 गुट के नेता बीते साल में कांग्रेस आलाकमान को चिट्ठी लिखने के बाद से ही पार्टी में एक अलग गुट बनाकर चल रहे हैं.

इसमें शामिल अधिकतर नेता पार्टी में लंबा वक़्त बिता चुके हैं और काफ़ी अनुभव भी रखते हैं. लेकिन इतने अहम मौक़े पर जब कांग्रेस पांच राज्यों का चुनाव लड़ने की तैयारियों में जुटी है, बड़े नेताओं द्वारा पार्टी पर सवाल उठाने से निश्चित रूप से इसकी फजीहत तो हो ही रही है, पहले से ही बुरी हालत में चल रही कांग्रेस और कमजोर होगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

कौन हैं पीरजादा अब्बास सिद्दीक़ी

पीरजादा अब्बास सिद्दीक़ी को उनके समर्थक भाईजान कहकर बुलाते हैं. हुगली जिले में स्थित धार्मिक स्थल फुरफुरा शरीफ से आने वाले अब्बास सिद्दीक़ी ने कुछ वक़्त पहले ही अपनी पार्टी लांच की है और वह चुनावी सभाओं में टीएमसी को हराने की बात करते हैं. उनकी हालिया सभाओं में काफी भीड़ जुटी है और हुगली इलाक़े के मुसलिम मतदाताओं में उनका ख़ासा असर माना जाता है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी मुसलिम मतदाताओं के भरपूर वोट मिलते रहे हैं, ऐसे में आईएसएफ़ के चुनाव लड़ने से ममता की पार्टी टीएमसी को नुक़सान हो सकता है. पीरजादा अब्बास सिद्दीक़ी सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस से नाख़ुश बताए जाते हैं और उन्होंने कहा है कि आईएसएफ़ को उसका पूरा हक़ मिलना चाहिए. लेफ़्ट फ़्रंट इस बात से इनकार करता है कि आईएसएफ़ किसी तरह की सांप्रदायिक राजनीति करता है.

लेकिन जब कांग्रेस के बड़े नेता आईएसएफ़ को खुलकर सांप्रदायिक बता रहे हैं तो ऐसे में कांग्रेस-लेफ़्ट फ़्रंट का गठबंधन बीजेपी के सवालों का जवाब कैसे देगा क्योंकि बीजेपी का कहना है कि आईएसएफ़ सांप्रदायिक है और इसे लेकर कांग्रेस में ही घमासान छिड़ा हुआ है. आईएसएफ़ को इस गठबंधन में शामिल किया जाएगा या नहीं, इस पर फ़ैसला होना बाक़ी है लेकिन आनंद शर्मा के ट्वीट्स ने पार्टी को मुसीबत में ज़रूर डाल दिया है.

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