Brijesh Mishra New

403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश के नतीजों को लेकर सभी उत्सुक हैं. उससे पहले अभी उत्तर प्रदेश में कुछ चरणों के चुनाव होना बाकी हैं. अभी तक के हो चुके मतदान में मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच नजर आ रहा है. लेकिन पलड़ा जानकारों के मुताबिक समाजवादी पार्टी का भारी नजर आ रहा है. समाजवादी पार्टी और बीजेपी अपनी अपनी जीत को लेकर तमाम तरह के दावे कर रही है.

तमाम जानकारों का कहना है कि बीजेपी जनता के मुद्दों पर अभी तक बैकफुट पर नजर आ रही है, इसलिए अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के रूप में उत्तर प्रदेश को अपना अगला मुख्यमंत्री मिलेगा. हालांकि यह राजनीतिक विश्लेषकों का अपना ओपिनियन है. लेकिन 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में जिस तरह समाजवादी पार्टी को हाथों हाथ लिया जा रहा है, स्वयं अखिलेश यादव भी खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं.

इन सबके बीच उत्तर प्रदेश में अभी तक के जितने भी चरण संपन्न हुए हैं उसमें एक चीज देखने को मिली है, ग्रामीण क्षेत्रों में बंपर वोटिंग हुई है. लेकिन शहरी मतदाता वोटिंग को लेकर उत्साहित नजर नहीं आए हैं. शहरी क्षेत्रों में उम्मीद से कहीं कम मतदान अभी तक के चरणों में हुआ है. शहरी मतदाता मुख्य रूप से बीजेपी का कोटर माना जाता है.

शहरी क्षेत्रों में हुए कम मतदान को लेकर भारत समाचार के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्रा (Brijesh Mishra) ने एक ट्वीट किया है. उन्होंने लिखा है कि, शहर में कम मतदान अध्ययन का विषय है. यूपी के चुनाव में इस बार नगरीय जनता की दिलचस्पी कम क्यों है? औसत से भी कम मतदान हो रहा है. मसलन, प्रयागराज जैसे बड़े शहर में कम मतदान हुआ. जबकि गांव-देहात इसके अपवाद है. वहां अधिक मतदान हो रहा है. यह किस प्रकार के संकेत है, स्टडी होनी चाहिए.

आपको बता दें कि ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी के प्रति नाराजगी बताई जा रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी का असर दिखाई दे रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में अगर बंपर वोटिंग हो रही है तो माना जा रहा है कि सत्ता के खिलाफ हो रही है और शहरी मतदाता बीजेपी का समर्थक माना जाता है, उसमें वोटिंग को लेकर उत्साह कम नजर आ रहा है.

हालांकि 10 मार्च को ही पता चलेगा की उत्तर प्रदेश की जनता ने उत्तर प्रदेश की गद्दी किसके हवाले करती है. लेकिन इतना तय लग रहा है कि शहरी मतदाता ध्रुवीकरण की राजनीति से तंग आ चुका है या फिर अगर वह अपनी पसंदीदा पार्टी को वोट देने के लिए नहीं निकल रहा है तो कहीं ना कहीं उसके मन में मलाल है कि उसको जो उम्मीदें थी सत्ताधारी पार्टी से, वह पूरी नहीं हुई.

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