Putin

रूस के राष्ट्रपति पुतिन (Putin) ने कहा है कि यूक्रेन (Ukraine) नाजी आतंकियों जैसा बर्ताव कर रहा है. उन्होंने आगे कहा है कि हम यूक्रेन पर कब्जा नहीं करना चाहते, लेकिन उसे परमाणु हथियार भी नहीं बनाने देंगे. पुतिन ने सुरक्षा परिषद के साथ बैठक में कहा कि नाटो ने लाल रेखा पार कर ली है, तो वही यूक्रेन नागरिकों को ढाल बना रहा है.

ताजा जानकारी मिल रही है कि यूक्रेन से बातचीत को तैयार हो चुके रूसी राष्ट्रपति ने ऐसी शर्त रख दी है जिसे मानना शायद ही मुमकिन हो पाए. पुतिन का कहना है कि अगर जंग रोकनी है और बातचीत की टेबल पर आना है तो यूक्रेन की मौजूदा सरकार को हटाया जाए और सेना को अपने हाथ में कमान लेनी होगी.

पुतिन ने कहा है कि हम यूक्रेन में आतंकियों से लड़ रहे हैं. उन्होंने यूक्रेन की सरकार को ड्रग्स के आदि और नाजियों समर्थक करार दिया है. उन्होंने सेना से अपील करते हुए कहा कि मौजूदा सरकार को हटाकर आर्मी को देश की कमान संभालनी चाहिए.

आपको बता दें कि रूसी सेना ने पूरी ताकत के साथ यूक्रेन पर हमला किया है और यूक्रेन के भीतर रूसी सेनाएं पहुंच गई हैं. कई हफ्तों तक पहले कूटनीतिक प्रयासों के विफल रहने के बाद पुतिन ने यूक्रेन पर सैन्य ऑपरेशन शुरू कर दिया था.

अमेरिका रूस यूक्रेन जंग में क्यों नहीं कूदा?

रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग में अमेरिका को भी एक विलेन के रूप में देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि अमेरिका की तरफ से सिर्फ बयानबाजी की गई है और जमीन पर रूस को रोकने के लिए कुछ नहीं हुआ और ना ही यूक्रेन को कोई सहायता दी गई. ऐसे में सवाल उठता है कि रूस यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में अमेरिका शांत क्यों पड़ गया है?

जानकारों के मुताबिक अमेरिका को इस बात का एहसास है कि उसका असली दुश्मन रूस नहीं बल्कि चीन है. वहीं चीन जिससे इस समय उसकी कई मोर्चों पर तनातनी चल रही है. चीन के जो सपने हैं वह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. रूस तो सिर्फ यूक्रेन तक हमला कर शांत है, लेकिन चीन दुनिया की महाशक्ति बनना चाहता है. वह अमेरिका को हटाकर खुद सुपर पावर बनना चाहता है. इसी वजह से कहा जा रहा है कि अमेरिका रूस के खिलाफ अपनी ज्यादा उर्जा नहीं लगाना चाहता.

देखा जाए तो अमेरिका की चिंता गलत भी नहीं है. क्योंकि हर मामले में चीन रूस की तुलना में काफी शक्तिशाली है. बात जब चीन की अर्थव्यवस्था की आती है तो यह रूस की तुलना में 10 गुना बड़ी है. वहीं जब दोनों देशों की सैन्य शक्तियों को देखा जाता है तो चीन इस मोर्चे पर भी चार गुना ज्यादा खर्च करता है. इस समय चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना मौजूद है और मैन्यूफैक्चरिंग का भी वह बड़ा हब बन गया है.

ऐसे में अमेरिका किसी भी कीमत पर चीन को आगे निकलने का मौका नहीं दे सकता. जानकार भी यही मानते हैं कि अमेरिका ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह अभी युद्ध कर सके या फिर रूस के खिलाफ किसी तरह की सैन्य कार्रवाई करें. यही कारण है कि अमेरिका इस बार खुद को सिर्फ निंदा करने और प्रतिबंध लगाने तक सीमित रख रहा है.

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