Maharashtra political crisis Amit Shah

उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के इस्तीफा देने के दूसरे दिन महाराष्ट्र में जारी सियासी उथल-पुथल (Maharashtra political crisis) फ़िलहाल खत्म होती हुई नजर आ रही है. अगले दिन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस (Devendra Fadnavis) जब एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ एक अजीब सा संतोष था. देवेंद्र फडणवीस ने फिर से दोहराया कि महाविकास आघाडी सरकार अपने ही अंतर्विरोध से गिरी है. उन्होंने बीजेपी का हाथ होने से इनकार किया.

लेकिन चलती प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐसा लगा मानो किसी को भी अंदाजा नहीं था कि देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. देवेंद्र फडणवीस को भी ऐसा लग रहा था कि पहले नहीं पता था कि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनना है. लेकिन अचानक ही देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर दिया. देवेंद्र फडणवीस कि यह घोषणा सियासी विश्लेषकों को हैरान कर गई. ऐसा पूर्व मुख्यमंत्री जिसे बीजेपी ने मुख्यमंत्री का प्रत्याशी भी घोषित किया हो. एक ऐसा पूर्व मुख्यमंत्री जिसके पास 120 विधायकों का समर्थन हो, वह अपनी कुर्सी को एक शिवसैनिक के लिए छोड़ रहा था. फैसला हैरानी भरा था.

हैरानी भरा भी इसलिए था क्योंकि बीजेपी ने शिवसेना से मुख्यमंत्री पद की वजह से गठबंधन तोड़ा था और अब बीजेपी ने शिवसेना के ही बागी विधायक को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया है. एकनाथ महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले चुके हैं. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद देकर बीजेपी ने क्या पाया है?

उद्धव को मिली सहानुभूति खत्म करने की रणनीति

शिवसेना प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा देने से पहले फेसबुक लाइव के जरिए अपने लिए सहानुभूति बटोरने की कोशिश की थी. आखिरी कैबिनेट बैठक मैं औरंगाबाद और उस्मानाबाद का नाम बदलने का प्रस्ताव पारित करना इसी का एक हिस्सा था, ताकि शिवसेना के मतदाताओं को पार्टी के साथ विचारधारा से समझौता न करने के नाम पर बनाए रखा जा सके. लेकिन देवेंद्र फडणवीस के एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने के ऐलान के साथ ही उद्धव ठाकरे के लिए पैदा हुई सहानुभूति 0 करने की कोशिश बीजेपी ने की.

क्योंकि खुद उद्धव ठाकरे ने भी बीजेपी से शिवसेना की राह अलग होने का कारण मुख्यमंत्री पद को बताया था. लेकिन बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर विचारों के उस बुलबुले को ही फोड़ने की कोशिश की है. लेकिन क्या ऐसा संभव होगा यह आने वाला वक्त बताएगा.

शिवसेना में निचले स्तर तक बगावत की कोशिश

एकनाथ शिंदे का मुख्यमंत्री बनाना हैरान करने वाला फैसला है. लेकिन उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बागी हुए विधायकों की वापस लाने की कोई भी अपील और दाव अभी तक कामयाब होता हुआ दिखाई नहीं दिया है. उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ ही विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा दिया है. तो माना जा सकता है कि उनका यह फैसला इसलिए था, ताकि कुछ विधायक वापस आ सके. लेकिन बीजेपी ने इस कोशिश पर पानी फेरने का काम किया है. एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने शिवसेना में हुई टूट को और बड़ा बनाने की कोशिश की है.

हिंदुत्व की कीमत पर सत्ता नहीं यह संदेश देने की कोशिश

उद्धव ठाकरे ने शिवसेना को एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन दिला कर महा विकास आघाडी सरकार बना ली थी. इसके बाद से ही तमाम कांग्रेस विरोधी लोग और बीजेपी उद्धव ठाकरे पर हिंदुत्व से समझौता करने का आरोप लगाते रहे. शिवसेना और खुद उद्धव ठाकरे हमेशा बोलते रहे कि उन्होंने कभी हिंदुत्व से समझौता नहीं किया. बागी विधायकों ने और खास तौर पर एकनाथ शिंदे ने भी यही कहा कि उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री रहते हुए शिवसेना ने हिंदुत्व के मुद्दे पर समझौता किया. बीजेपी ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्व को खूंटी पर टांग कर कुर्सी पाई थी. देवेंद्र फडणवीस ने भी कहा कि शिवसेना ने बाला साहब ठाकरे के विचारों को किनारे रखते हुए महा विकास आघाडी सरकार बनाने का फैसला किया था.

बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह हिंदुत्व की कीमत पर सत्ता पाने की कोशिश नहीं करती. बल्कि हिंदुत्व का समर्थन करने वालों को उचित सम्मान भी देती है. देवेंद्र फडणवीस का खुद आकर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा करना उसी रणनीति का हिस्सा है. एकनाथ शिंदे की बगावत को राजनीतिक पंडितों ने बीजेपी का ऑपरेशन लोटस करार दिया था. एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी उन तमाम आलोचकों को जवाब देने की कोशिश कर रही है. जबकि कहा अभी भी यही जा रहा है कि चलती हुई सरकार गिराकर बीजेपी ने एकनाथ शिंदे की बगावत को पर्दे के पीछे से हवा दी.

इनमें बीजेपी कुछ भी फायदा देखती हो लेकिन सवाल कई हैं

जो देवेंद्र फडणवीस सरकार जाने के बाद से ही लगातार उद्धव सरकार को उखाड़ फेंकने की जुगत में जुटे हुए थे वह उपमुख्यमंत्री बंद कर खुश होंगे? जिन देवेंद्र फडणवीस के लिए माना जा रहा है कि उन्होंने ही “ऑपरेशन शिंदे” को लीड किया, वह उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों बैठा दिए गए? जब देवेंद्र फडणवीस ने साफ कहा था कि वह सरकार में शामिल नहीं होंगे तो आखिर 2 घंटे में क्या हुआ कि उन्हें उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी पड़ी? शपथ ग्रहण समारोह में देवेंद्र फडणवीस की बॉडी लैंग्वेज जिसने भी देखी वह बता सकता है कि उपमुख्यमंत्री बनकर वह खुश नहीं है. चेहरे पर चमक नहीं थी, मुस्कान नहीं थी. ऐसा लग रहा था जैसे ठगा सा महसूस कर रहे हो.

2 घंटे के अंदर पासा पलट गया. अजीबोगरीब तरीके से बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा (JP Nadda) ने कहा कि देवेंद्र फडणवीस को सरकार में शामिल होना चाहिए. अजीबोगरीब तरीका इसलिए, क्योंकि बीजेपी में यह बातें मीडिया के जरिए कहीं जाएं यह सामान्य नहीं. आखिर क्यों उन्हें यह बात मीडिया मे आकर कहनी पड़ी, देवेंद्र को सरकार में शामिल होना चाहिए. क्यों नहीं यह बात उन्होंने टेलीफोन उठा कर देवेंद्र फडणवीस से कहीं.

उस वक्त क्यों नहीं कहा जब वह दिल्ली आए थे. क्या देवेंद्र फडणवीस नहीं मान रहे थे और उन पर दबाव बनाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व की इच्छा जगजाहिर की गई? इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) का ट्वीट आया कि नड्डा जी के कहने पर फडणवीस ने सरकार में शामिल होने का फैसला किया है. अमित शाह के ट्वीट से एकदम साफ है कि देवेंद्र फडणवीस को इच्छा के विपरीत उपमुख्यमंत्री बनना पड़ा. लिहाजा महाराष्ट्र जीतकर भी संकेत मिल रहे हैं कि शायद बीजेपी के अंदर दिल्ली और मुंबई के मतभेद हैं.

देवेंद्र फडणवीस को बीजेपी ने निपटा दिया?

इस पूरे राजनीतिक खेल का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि क्या बीजेपी ने एकनाथ शिंदे नामक तीर से उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस दोनों को एक साथ निपटा दिया है? उद्धव की कुर्सी तो गई, उनकी पार्टी भी तबाह हो गई. लेकिन बीजेपी नेतृत्व देवेंद्र फडणवीस के पर क्यों कतरना चाहता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र में बीजेपी के अंदर सबसे ताकतवर बन चुके हैं. दूसरा कोई नेता उनकी लाइन में नजर नहीं आता है. दो लोगों से संचालित अतीक केंद्रीकृत पार्टी को यह बात पसंद नहीं आ रही थी?

याद कीजिए अक्टूबर 2019 जब अजित पवार के समर्थन के भरोसे देवेंद्र फडणवीस ने सुबह-सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और कुछ ही घंटे के अंदर उन्हें पद त्याग करना पड़ा. उससे पहले अमित शाह मुंबई आ रहे थे, लेकिन आखिरी समय में उन्होंने अपना दौरा रद्द कर दिया. तब बीजेपी की बड़ी किरकिरी हुई थी. इस शर्मनाक स्थिति में लाने के दोषी उस वक्त देवेंद्र फडणवीस ही माने गए थे. कहा जाता है उन्होंने यह सारा काम आलाकमान को भरोसे में लिए बिना ही किया था. तो क्या माने अब पार्टी आलाकमान ने उन्हें इस बात की सजा दी है?

इन सबके अलावा एक पहलू यह भी है कि जो कुछ भी ड्रामा मुंबई में चल रहा है उससे एक बात तो साफ नजर आ रही है कि, महाराष्ट्र की सियासी पिक्चर अभी बाकी है.

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