Mansoor Ahmed Khan

पाकिस्तान की मदद से चीन की तानाशाह सरकार तालिबान को आर्थिक सहायता देने का वायदा कर चुकी है. इस बात का खुलासा पहली बार तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने किया है. दरअसल अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फौज की रुखसती होते ही काबुल में चीन की एम्बेसी में बैठकों का दौर शुरू हो गया है.

सूत्रों के मुताबिक तालिबान की मदद करने के लिए चीन के अफ़ग़ानिस्तान में राजदूत वांग यू और पाकिस्तान के राजदूत मंसूर अहमद खान के बीच कई दौर की बातचीत काबुल में हो चुकी है. मंसूर अहमद को तालिबान नेतृत्व का सबसे करीबी राजदूत बताया जाता है. चीन की नए तालिबानी नेतृत्व से दोस्ती के पीछे भी मंसूर का बड़ा रोल है. कहने वाले कहते हैं कि जो मंसूर कहे, वही तालिबान को मंज़ूर है.

सूत्रों ने बताया कि बीते 15 अगस्त को जब तालिबान लड़ाकों ने काबुल पर कब्ज़ा किया तो पाक राजदूत मंसूर अहमद खान सबसे पहले राजनयिक थे जो तालिबानी नेतृत्व से मिले. उसके बाद 18 अगस्त को शाह महमूद ग़ाज़ी स्थित चीनी दूतावास में मंसूर अहमद की वांग यू से बातचीत हुई. मंसूर अहमद की तालिबान को लेकर 1 सितम्बर को फिर वांग यू से फिर आधिकारिक वार्ता हुई जो तालिबान को रणनीतिक मदद करने को लेकर बताई जाती है. इस मुलाकात की तस्दीक खुद पाकिस्तान सरकार ने की है.

सूत्रों के मुताबिक मंसूर मौजूदा समय में प्रधानमंत्री इमरान खान के सबसे विश्वसनीय राजनायिक हैं. अफ़ग़ानिस्तान में जब से अमेरिका फौजों की वापसी का विचार शुरू हुआ था तभी इमरान खान उन्हें काबुल ले आये. यूँ भी इमरान खान खुद पश्तून है, इसलिए उनकी तालिबान के नेताओं से करीबी रिश्ते हैं. सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान चाहता है कि चीन को काबुल में पूरी तरह स्थापित करके वो तालिबान और चीन के बीच पुल का काम करे. जिससे एशिया में इस्लामाबाद का रसूख बढ़ सकेगा.

चीन के साथ साझेदारी करके पाकिस्तान अपने पड़ौस में गैस और तेल के ज़खीरों में सेंधमारी करना चाहता है. उधर चीन की कोशिश है कि 2007 में जो खरबों रूपये के माइनिंग पट्टे इस साल जनवरी में अमेरिका के दबाव में रद्द कर दिए गए, वही पट्टे अब उसे दुबारा मिल जायें. इस बीच तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने इटली के अखबार ‘ला रिपब्लिका’ को इंटरव्यू दिया है. इसमें उन्होंने तालिबान और चीन के करीबी रिश्तों का खुलासा किया.

मुजाहिद ने कहा- कि अफगानिस्तान की अर्थ व्यवस्था बेहद खस्ता हालत में है. तालिबान के पास देश चलाने के लिए पैसा नहीं है. लेकिन इस मुश्किल वक़्त में चीन की मदद से वे आर्थिक हालात सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर जब फतह की तो सारे देश पर उसका कब्जा हो गया था. 31 अगस्त तक सभी विदेशी सैनिक अफगानिस्तान छोड़कर चले गए. इसके बाद अफगानिस्तान के विदेश में जमा फंड्स को अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों ने फ्रीज कर दिया. चीन इस मौके का अब फायदा उठाता दिख रहा है.

एक सवाल के जवाब में तालिबान प्रवक्ता मुजाहिद ने कहा कि चीन उनका सबसे भरोसेमंद सहयोगी है. चीन ने वादा किया है कि वो अफगानिस्तान में इन्वेस्टमेंट करके इसे नए सिरे से तैयार करेगा. सिल्क रूट के जरिए वो दुनिया में प्रभाव बढ़ाना चाहता है. इसके जरिए अफ़ग़ानिस्तान भी दुनिया तक अपनी पहुंच बना सकते हैं. अफ़ग़ानिस्तान में तांबे की खदाने हैं. चीन इन्हें आधुनिक तरीके से फिर शुरू करेगा. हम दुनिया को तांबा बेच सकेंगे.

मुजाहिद की बातों से साफ़ है कि पाकिस्तान, तालिबान और चीन अब एक मंच पर हैं और इस तिकड़ी को रूस का पूरा समर्थन है. चीन को ये भी उम्मीद है कि अमेरिका भले ही कुछ समय के लिए तालिबान के नज़दीक न आये पर धीरे धीरे यूरोप के कुछ देश, तालिबान से व्यापारिक रिश्ते बना सकते हैं.

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