Priyanka akhilesh yogi Uttar Pradesh assembly elections 2022

सभी की नजरें पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई थी. खासतौर पर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh assembly elections 2022) पर. इसी बीच रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का आगाज हो गया और दुनिया की निगाहें रूस और यूक्रेन पर टिक गई. भारतीय नागरिकों की निगाहें भी देश में हो रहे विधानसभा चुनाव से हटकर रूस और यूक्रेन में जारी युद्ध पर जा टिकी.

लेकिन उत्तर प्रदेश में चार चरण के चुनाव बीत चुके हैं. इन चार चरणों में कौन बाजी मारता हुआ दिखाई दे रहा है? अगर चार चरणों में हुए मतदान की बात की जाए तो मतदान का प्रतिशत इन चारों चरणों में गिरा है. चौथे चरण में 9 जिलों की 59 सीटों पर हुए मतदान का आंकड़ा भी 61.65% था. चौथे चरण को बीजेपी के लिए अग्निपरीक्षा कहा जा रहा था.

क्योंकि उसके पहले हुए तीन चरणों में बीजेपी अपना वह प्रदर्शन दोहराते हुए दिखाई नहीं दे रही है जो 2014 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था, उसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था और फिर वही प्रदर्शन 2019 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था. शुरुआती दो चरणों के बाद बीजेपी को एक बार फिर से चौथे चरण में किसान आंदोलन की तपिश और किसानों पर गाड़ी चढ़ाने के आरोपों से घिरे आशीष मिश्रा की वजह से समीकरण बिगड़ने की संभावना भी बताई जा रही है.

जिन जिलों में किसान आंदोलन का प्रभाव है उन जिलों में बंपर वोटिंग हुई है और यह बंपर वोटिंग सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं शहरी क्षेत्रों में भी पहले के चरणों की तरह ही मतदान प्रतिशत कम रहा है. माना जा रहा है कि इसका सीधा फायदा समाजवादी पार्टी को मिलने वाला है. हालांकि इन इलाकों में बसपा और कांग्रेस ने भी अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है.

वैसे तो सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं. लेकिन सियासत का समीकरण कहां फिट बैठता है इसका फैसला 10 मार्च को आने वाले चुनावी नतीजे ही तय करेंगे. ऐसी स्थिति में सवाल उठना लाजमी है कि क्या चौथे चरण में बीजेपी को नुकसान हुआ है या बहुकोणीय मुकाबले ने एक बार फिर बीजेपी की राह आसान कर दी है?

किसान बहुल क्षेत्रों में बंपर वोटिंग किस ओर इशारा कर रही है?

चुनाव आयोग के अनुसार सबसे ज्यादा 67.16 प्रतिशत मतदान पीलीभीत में हुआ है. किसानों को गाड़ी से कुचलने के आरोपों से घिरे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे आशीष मिश्रा के लखीमपुर खीरी जिले में 67.15 प्रतिशत मतदान हुआ है. वही सीतापुर जिले में 62.66% लोगों ने वोट डाला है. कम मतदान जहां हुआ है वहां किसे फायदा होगा इस पर भी सवालिया निशान है.

उत्तर प्रदेश के पंजाब में क्या बीजेपी का खेल बिगड़ गया?

चौथे चरण के वोटिंग ट्रेंड को अगर समझा जाए तो सामने आता है कि सिख समुदाय की अच्छी खासी संख्या वाली लखीमपुर खीरी और पीलीभीत की कुछ सीटों पर मतदान प्रतिशत बढ़ा है. पीलीभीत की पूरनपुर विधानसभा में सबसे ज्यादा सीट हैं जो पिछली बार की तुलना में करीब 8% अधिक मतदान करके आए हैं. लेकिन यहां गौर करने वाली बात है कि सिख समुदाय तो पहले से ही मतदान को लेकर जागरूक रहा है, तो इस बार किन लोगों की वजह से मतदान प्रतिशत बढ़ गया?

पीलीभीत के भाजपा सांसद वरुण गांधी लंबे समय से बागी तेवर दिखा रहे हैं. क्या पीलीभीत की सीट पर मतदान प्रतिशत बढ़ने की वजह वही हैं? अगर ऐसा है तो बीजेपी के लिए यह बड़ी समस्या हो सकती है. हालांकि बीजेपी ने हर चरण में ध्रुवीकरण के साथ ही लॉ एंड ऑर्डर का सियासी दांव खेला है, जो मतदाताओं को उसके पक्ष में लामबंद करने के लिए काफी कहा जा सकता है. लेकिन क्या इस बार के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी का यह सियासी दांव सफल होगा?

उत्तर प्रदेश के 2022 में जो विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उसमें ओबीसी और दलित मतदाताओं को ही निर्णायक माना जा रहा है. लेकिन ओबीसी और दलित मतदाताओं का अब तक के हुए चरणों के मतदान में रुख एकतरफा समर्थन या विरोध वाला नहीं दिखाई दे रहा है. बीजेपी ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए जो वोट बैंक तैयार किया है उसे हिलाने के लिए समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी समेत अन्य राजनीतिक दल पूरी कोशिश कर रहे हैं.

अगर आसान शब्दों में समझा जाए तो ओबीसी और दलित वोटों की लड़ाई में हिस्सेदारी बढ़ गई है. मुस्लिम मतदाताओं की बात करें तो अभी तक के वोटिंग पैटर्न को देखते हुए यही मतदाता वर्ग समाजवादी पार्टी के साथ नजर आ रहा है. लेकिन हर सीट के अलग-अलग सियासी समीकरणों के चलते मुस्लिम वोट बैंक के बटने की संभावना कहीं ज्यादा बढ़ जाती है.

दलितों पर जहां मायावती अपना अधिकार समझती थी, वहीं इस बार दलितों के वोट बैंक में समाजवादी पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस ने भी सेंध लगाई है. प्रियंका गांधी लगातार चुनाव से पहले से ही दलितों की आवाज बुलंद किए हुए हैं. इसके ठीक उलट गरीबों को राशन देकर बीजेपी जो एहसान दिखा रही है, उसका असर जमीन पर कितना पड़ता है और उससे बीजेपी को कितना नुकसान होता है इसका असर भी 10 मार्च को नतीजों पर दिखाई देगा.

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