Vijay Rupani

मुश्किल से पंद्रह दिन पहले जब मोदी सरकार के पांच नए मंत्रियों की गुजरात में ‘जन आशीर्वाद यात्रा ‘ समाप्त हुई तो इसी के साथ सीएम विजय रुपानी (Vijay Rupani) के अध्याय की समाप्ति की भी रूप रेखा तैयार हो गयी. दरअसल जन आशीर्वाद रैली से ज्यादा भीड़ तो प्रदेश में आम आदमी पार्टी की जनसंवेदना रैली में देखी गयी थी.

शायद इसलिए इस यात्रा में लोगों की अरुचि देखकर भाजपा बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर हुई जिसमे एक वजह रुपानी को कुर्सी से हटाना भी शामिल था. लेकिन ये यात्रा, रुपानी के सत्ता से प्रस्थान की एकमात्र वजह नहीं थी. सच तो ये है कि गुजरात में सरकार और संगठन में मतभेद कुछ ज्यादा ही बढ़ते जा रहे थे.

सीएम विजय रुपानी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सी आर पाटिल के बीच 36 का आंकड़ा, मंत्री और विधायक तक के कामकाज में परेशानी का सबब बन रहा था. सी आर पाटिल की प्रधानमंत्री मोदी से नज़दीकी, रुपानी की मुश्किल दूनी कर रही थी. इस बीच भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने जब गुजरात में राज्य सरकार के कामकाज को लेकर सर्वे कराया तो मोदी-शाह की ऑंखें खुल गयीं.

सर्वे से जाहिर था कि रुपानी के चेहरे पर अगर 15 महीने बाद भाजपा ने विधान सभा चुनाव लड़ा तो दशकों बाद पार्टी को हार का मुँह देखना पड़ सकता है. वैसे भी 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात को किसी भी कीमत पर गंवाने की मोदी कभी सोच भी नहीं सकते हैं. जिस राज्य से मोदी-शाह की जोड़ी दिल्ली में स्थापित हुई और जो ‘गुजरात मॉडल देश की राजनीति में मुहावरा बन गया हो, उस राज्य को हारने का मतलब सियासत में ‘डिस्क्रेडिट’ होने जैसा था.

जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने खुद फैसला लिया कि पार्टी की साख के लिए रुपानी को जाना ही होगा और ये फैसला वो टालना नहीं चाहते थे. बताया जाता है कि रुपानी को संदेसा भिजवाने से पहले प्रधानमंत्री ने ये राय अपने विश्वासपात्र सी आर पाटिल से साझा की जो काफी समय से मुख्यमंत्री बदलने की बात पर ज़ोर दे रहे थे. पार्टी के एक पदाधिकारी का कहना था कि गांधीनगर में पाटिल एकलौते ऐसे आदमी थे जिन्हे काफी पहले से ये मालूम था की रुपानी कुर्बान होने वाले हैं.

सच तो ये है कि विजय रुपानी और अमित शाह की अगुवाई में पार्टी ने 2017 में जब विधान सभा चुनाव लड़ा तो वो कांग्रेस से हारते-हारते बची. अगर चुनाव के आखिरी चरण में मोदी, धुआंधार रैली करके पाकिस्तान का कार्ड न खेलते तो रुपानी, भाजपा की नाव डूबा चुके होते. फिर भी 150 सीट का वायदा करने वाले रुपानी बड़ी मुश्किल से 97 तक पहुँच पाये.

बहरहाल चुनाव जीतने के बाद, लो-प्रोफाइल रखने वाले रुपानी के लिए गुजरात में मोदी, शाह, अम्बानी, अडानी और आरएसएस की अलग अलग लॉबियों को झेलना कठिन था. उस पर, उनके धुर विरोधी भाजपा सांसद सी आर पाटिल का प्रदेश अध्यक्ष बनना रुपानी के लिए और भी ज्यादा कष्टकारी हो गया. इस बीच कोरोना में सर्वाधिक स्थिति गुजरात में बिगड़ी और एक के बाद एक, राज्य में सैकड़ों मौतों ने रुपानी सरकार की कार्यकुशलता पर प्रश्न लगा दिए.

विपक्ष ने बदहाली का ठीकरा रुपानी के सिर फोड़ा और लॉक डाउन से होने वाली आर्थिक मंदी का जिम्मेदार भी उन्हें ठहराया. उधर विकास और पुरानी परियोजनाएं भी प्रदेश में ठप ही रही. हालाँकि काम काज को गति देने के लिए मोदी ने अपने पुराने प्रमुख सचिव के कैलाशनाथन को रिटायर्ड होने के बाद , चीफ मिनिस्टर ऑफिस की बागडोर थमा दी लेकिन ढेर सारी समस्याओं में उलझे राज्य को एक अफसर कैसे संभाल पाता.

कुल मिलकर मोदी पिछले कुछ महीनों से रुपानी का विकल्प ढून्ढ रहे थे और जन आशीर्वाद यात्रा में जनता का मूड भांपकर उन्होंने तय कर लिया कि रुपानी को कुर्सी से हटाना ही होगा. यूं भी पार्टी जान रही थी कि रुपानी को अभी नहीं किनारे किया तो भाजपा को आगे जनता किनारे लगा देगी.

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