Mamata Banerjee Sonia Gandhi

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की राष्ट्रपति चुनाव 2022 की सक्रियता ने साफ कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस का 2024 के आम चुनाव को लेकर इरादा क्या है. अभी तो ऐसा ही लगता है कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस मुक्त विपक्ष की मुहिम से कदम पीछे खींच लिए हैं, या यूं कहें कि मोदी के सपने को साकार करने से थोड़ा पीछे हट गई है या वह ख्वाब फिलहाल देखना बंद कर दिया. लेकिन सहयोगी से ज्यादा बड़ा रोल देने को तैयार नहीं लगती विपक्ष नेतृत्व तो कतई मंजूर नहीं है.

ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेकर केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को चैलेंज करने के मकसद से विपक्ष के कई मुख्यमंत्रियों और नेताओं को पत्र भेजकर मीटिंग के लिए बुलाया है. हालांकि संभावित सूची से गायब कुछ नामों को लेकर ताज्जुब भी होता है. वैसे उसमें राजनीति के अलग समीकरण देखें और समझे जा सकते हैं. ममता की यह कोशिश सोनिया गांधी की पहल के समांतर देखी जा रही है.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि सोनिया गांधी ने विपक्ष को एकजुट करने की पहल की शुरुआत ममता बनर्जी और शरद पवार के साथ बातचीत से की थी और ममता बनर्जी ने भी पत्र लिखकर सोनिया गांधी को भी बुलाया है. ऐसे में सवाल ये उठने लगा है कि सोनिया गांधी की राह में ममता बनर्जी रोड़ा बन रही है या फिर बीजेपी की मददगार? कांग्रेस को लेकर ममता बनर्जी की सोच में बस थोड़ी सी तब्दीली आई है.

ममता को अब कांग्रेस से पूरी तरह परहेज नहीं लगता. वह कांग्रेस को विपक्षी खेमे में साथ रखने को तैयार हो गई है. लेकिन शर्त यह है कि सहयोगी बनकर ही रहना होगा. तो क्या कांग्रेस मान जाएगी? सोनिया गांधी कांग्रेस को विपक्ष का नेता हरगिज़ नहीं मान रही हैं. ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के जिन 22 नेताओं को विपक्ष की बैठक में बुलाने के लिए पत्र लिखा है, उनमें एक नाम बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का भी है.

टकराव सिर्फ यहां दिखाई दे रहा है कि ममता बनर्जी ने भी विपक्षी दलों की बैठक उसी दिन बुलाई है जिस दिन सोनिया गांधी ने. 15 जून को दोपहर के बाद 3 बजे. ममता बनर्जी ने जगह भी बता दिया दिल्ली का कॉन्स्टिट्यूशन क्लब. सवाल उठना लाजिमी है कि जिस दिन सोनिया गांधी ने मीटिंग बुलाई थी उसी दिन ममता ने भी क्यों बुलाई? विपक्षी दलों की समांतर बैठक का मुद्दा तो है ही. कई नेता इस बात से ज्यादा हैरान है कि ममता बनर्जी ने वही तारीख क्यों तय की है?

आखिर यह कोई संयोग है या फिर कोई प्रयोग है? कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ममता बनर्जी उस चर्चा का हिस्सा नहीं थी जहां सोनिया गांधी की अगुवाई वाली विपक्षी दलों की बैठक की तारीख तय की गई थी. विपक्षी दलों के कई नेताओं को यही बात परेशान कर रही है कि ममता बनर्जी को यह पता कैसे चला. यह तो ऐसा ही लगता है कि जिन लोगों के बीच बैठक की तारीख तय हुई उनमें से ही किसी ने ममता बनर्जी से शेयर किया है. मतलब ममता बनर्जी ना सिर्फ कांग्रेस के खिलाफ गोलबंदी कर रही है, बल्कि सोनिया गांधी के कदमों पर भी बारीक नजर रखे हुए हैं.

ममता बनर्जी ने कई नेताओं को बुलाया हुआ .है शिवसेना नेता संजय राउत का कहना है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बैठक का न्योता मिला हुआ है, लेकिन वह शामिल नहीं हो पाएंगे. क्योंकि उस दिन वह अयोध्या में होंगे. उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे को दिल्ली में 15 जून की बैठक का निमंत्रण मिला है, हम लोग उस समय अयोध्या में होंगे.

क्या कांग्रेस के खिलाफ ममता को सपोर्ट मिलेगा?

पश्चिम बंगाल चुनाव 2021 के बाद से ममता बनर्जी कांग्रेस को किनारे लगाने की कोशिश में है. ममता बनर्जी के ऐसा करने की स्ट्रैटेजी उसी समय समझ में आ गई थी लेकिन अब ज्यादा साफ हो चुकी है. 2019 के आम चुनावों से पहले ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी को विपक्षी खेमे का हिस्सा बनने का ऑफर दिया था जिसका वह खुद अघोषित तौर पर नेतृत्व कर रही थी. तब शरद पवार के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा और अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा जैसे नेता ममता बनर्जी के दिल्ली पहुंचते ही रणनीतियों में जुट जाते देखे गए थे.

उद्धव ठाकरे ने तो 15 जून को अयोध्या में होने का कारण ममता बनर्जी की मीटिंग में शामिल होने में असमर्थता के लिए बता दिया. लेकिन सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि विपक्ष की एक बैठक पहले से तय होने के बाद वह किसी दूसरी मीटिंग में नहीं जाने वाले. कहने की जरूरत नहीं है कि ममता बनर्जी को पहले से ऐसी आशंका होगी. लेकिन लगता है वह इस बार किसी को यह कहने का मौका नहीं देना चाहती हूं कि किसी नेता या पार्टी विशेष से वह परहेज कर रही हैं.

केसीआर और अरविंद केजरीवाल तो कांग्रेस के साथ आने से रहे. अभी तो यही लगता है. बाकी आगे राजनीति है. हो सकता है कि कांग्रेस के नेता केसीआर को मना भी ले तो अरविंद केजरीवाल को कांग्रेस कभी नहीं लेने वाली. क्योंकि अरविंद केजरीवाल की राजनीति पिछले कुछ दिनों से ऐसी रही है कि उन्हें सबका वोट चाहिए लेकिन वह मुसलमानों के मुद्दे पर बोलने से परहेज करते हैं. ठीक वैसे ही नवीन पटनायक अभी तक मोदी सरकार के साथ दिख रहे हैं. ममता बनर्जी उनको साथ लाने की कोशिश कर रही है, जिसमें अंदर से कांग्रेस को दूर रखने का ऑफर भी हो सकता है.

ममता बनर्जी राहुल गांधी को नेता मानने के लिए तैयार नहीं है. ममता बनर्जी का वोट बैंक कांग्रेस की तरह पूरे देश में नहीं है. तो किस आधार पर वह क्षेत्रीय दलों को अपने साथ लेकर आप आती है यह देखने वाली बात होगी. अभी तो 2024 बहुत दूर है. लेकिन यह तो साफ है कि राष्ट्रपति चुनाव में ममता बनर्जी ने बीजेपी की राह को आसान कर दिया है.

आपको बता दें कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का जनाधार सिर्फ और सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित है और यह बात उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी साबित हो गई थी. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद ममता अखिलेश यादव के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश गई थी और खास तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में उन्होंने बीजेपी पर प्रधानमंत्री मोदी पर जमकर हमला बोला था. लेकिन अखिलेश यादव को ममता बनर्जी के प्रचार का कोई लाभ नहीं मिला और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव हार गए. योगी आदित्यनाथ एक बार फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुए.

ममता बनर्जी जो सपने देख रही हैं वह कितने पूरे होंगे यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन इससे पहले भी कई लोग ममता बनर्जी की तरह विपक्ष का नेतृत्व करने और क्षेत्रीय दलों के सहयोग से प्रधानमंत्री बनने का सपना देख चुके है. लेकिन उनका क्या हश्र हुआ यह शरद पवार तथा अरविंद केजरीवाल से बेहतर कौन जानता है. अरविंद केजरीवाल भी 2019 के लोकसभा चुनाव में खुद को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर देख रहे थे. शरद पवार लंबे समय से यही चाहते रहे हैं लेकिन आज इन्हें अपने सपनों को छोड़ना पड़ा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here