Sharad Pawar.

राष्‍ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) इन दिनों खासे गुस्‍से में हैं. उनके गुस्‍से की वजह के बारे में अगर बात करे तो महाराष्‍ट्र में उनकी पार्टी तथा शिवसेना के नेताओं के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई जहां उन्‍हें बेचैन कर रही है वहीं राज्‍य के कोऑपरेटिव बैंकों (Cooperative banks) पर भारतीय रिजर्व बैंक की निगरानी और हस्‍तक्षेप उन्‍हें अखर रहा है.

कोऑपरेटिव बैंकों (Cooperative banks) के निदेशक मंडल में किसी भी व्‍यक्ति को नियुक्‍त करने का रिजर्व बैंक का अधिकार उनके गुस्‍से का प्रमुख कारण है, उनका कहना है कि चंद लोगों को फायदा पहुंचाने का यह हथियार है. पवार का कहना है कि रिजर्व बैंक की सहकारी बैंकों के प्रति नीतियां सहकारी बैंकों को कमजोर करने वाली हैं. उन्‍होंने कहा है कि सहकारी बैंकों की बागडोर एक विशिष्‍ट समूह को सौंपकर सहकारी आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है.

ज्ञात हो महाराष्ट्र में सहकारी निकायों का एक मजबूत नेटवर्क है, जो महाराष्‍ट्र की मौजूदा सरकार में शामिल एनसीपी और कांग्रेस के लिए समर्थन का एक बड़ा आधार भी है. पवार का कहना हे कि, ऐसा लगता है कि रिजर्व बैंक की नीति सहकारी बैंकों की संख्या को धीरे-धीरे कम करने की है, जो मुश्किल समय में आम आदमी की मदद करते हैं. ऐसी नीतियों से ही कोऑपरेटिव बैंक बंद हो जाते हैं और उनका दूसरे बैंकों में विलय कर दिया जाता है. यह सब न केवल सहकारी आंदोलन के लिए हानिकारक है बल्कि है आम आदमी के लिए भी खतरनाक है.

उन्‍होंने कहा कि सहकारी बैंकों के प्रति शीर्ष बैंक का ‘दृष्टिकोण’ ‘बिल्कुल उचित नहीं है’. आपको बता दें कि सितंबर 2020 में संसद द्वारा अनुमोदित बैंकिंग विनियमन अधिनियम में बदलाव किए जाने के बाद से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी आरबीआई द्वारा सहकारी बैंकों की निगरानी का विरोध कर रही है. संशोधित कानून के अनुसार, आरबीआई संबंधित राज्य सरकार के साथ परामर्श के बाद सहकारी बैंकों के निदेशक मंडल का स्थान ले सकता है.

शरद पवार (Sharad Pawar) इस बदलाव से सहमत नहीं है. उनका कहना है कि यह तय करना सहकारी संस्था के सदस्यों का अधिकार है कि बैंक की बागडोर किसे दी जाए, तथा निदेशक के रूप में किसे नियुक्त किया जाए और अगर उस निदेशक का प्रदर्शन ठीक नहीं है तो उसे हटा दें. लेकिन अब आरबीआई कह रहा है कि वह व्यक्ति को नियुक्त करेगा चाहे वह संस्था का सदस्य हो या नहीं इसलिए कुछ खास लोगों के हाथों में सहकारी क्षेत्र की बागडोर सौंप कर सहकारिता आंदोलन को धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.

ज्ञात हो नरेन्‍द्र मोदी सरकार ने हाल ही में सहकारिता मंत्रालय का गठन किया, जिसके प्रमुख केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैं. पवार ने पहले कहा था कि सहकारी समितियां राज्य सरकार के दायरे में आती हैं और केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती. उन्होंने कहा कि 97वें संशोधन में एक फॉर्मूला तय किया गया था कि एक राज्य सरकार सहकारी संस्था में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती है. सहकारी समितियों के प्रभावी प्रबंधन से संबंधित मुद्दों को लेकर 97वां संशोधन उन्‍होंने मंत्री रहते हुए पेश किया था.

पवार का कहना है कि मैंने राज्य के सहकारिता मंत्रियों और सहकारी संस्थानों के प्रमुखों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श और बैठकों के बाद संशोधन पेश किया था. 97 वें संशोधन का महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि यह इन संस्थानों में राज्य सरकारों के अनावश्यक हस्तक्षेप पर अंकुश लगाता है. शरद पवार का कहना है कि विपक्ष को अपने वश में करने के लिए ईडी का इस्तेमाल हथियार की तरह किया जा रहा है.

पवार का कहना है कि समय आता है गुजर जाता है सभी का समय आता है, यह कहकर उन्‍होंने यह अहसास कराने की कोशिश की है कि उनका भी समय आएगा. पवार की नाराजगी का आलम यह था कि उन्होंने संवाददाताओं से ही पूछ डाला कि क्या आपने अब तक ईडी की इतनी कार्रवाई देखी या सुनी है?

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