Rakesh Tikait

लंबे समय तक खबरों के केंद्र बिंदु में रहे किसान आंदोलन को लेकर आज बहुत कम लोग बात कर रहे हैं. मीडिया द्वारा एक तरह से किसान आंदोलन की खबरों को अपने पटेल से गायब कर दिया गया है. इस समय देश में महामारी को लेकर चर्चा है और मीडिया में एग्जिट पोल को लेकर.

किसान आंदोलन (Kisaan Aandolan) को लेकर सोशल मीडिया पर भी पहले की अपेक्षा चर्चा कम हो गई है. मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि बिलों के खिलाफ किसान लंबे समय से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं और मोदी सरकार से मांग कर रहे हैं कि इन तीनों कृषि बिलों को वापस ले लिया जाए. लेकिन मोदी सरकार किसानों की बात मानने के लिए तैयार नहीं है.

एक एजेंडे के तहत मीडिया द्वारा किसान आंदोलन को बदनाम करने के तरह-तरह के हथकंडे अपनाए गए. किसानों को खालिस्तानी तक बताया गया. किसानों पर आरोप लगाया गया कि उनको विदेशी फंडिंग हो रही है. किसानों को राजनीतिक पार्टियों के हाथ का खिलौना तक भाजपा के इशारे पर बताया गया. लेकिन किसान लगातार डटे रहे, इस सरकार के खिलाफ, इस सरकार की क्रूरता के खिलाफ.

आज देश में चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई है. ऑक्सीजन की किल्लत से दम तोड़ते लोगों की लाशें चारों तरफ दिखाई दे रही है, उनके परिजनों की चीखें चारों तरफ सुनाई दे रही है. मोदी सरकार (Modi Government) चारों तरफ से घिरी हुई है, महामारी को रोकने में मोदी सरकार पूरी तरीके से नाकाम साबित हुई है. इन सबके बीच किसान आंदोलन की खबरें कहीं पीछे छूट चुकी हैं.

आज किसान आंदोलन पर बहुत कम लोग बात कर रहे हैं. मीडिया में भी इसको लेकर खबरें बहुत ही कम हो गई हैं. बता दें कि किसान आंदोलन के उग्र रूप को देखकर मोदी सरकार के पैरों से जमीन खिसकने लगी थी. इन सबके बीच राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) ने आंदोलन को लेकर ट्वीट किया है. उन्होंने लिखा है कि लड़ाई लंबी चलेगी, कितने महीने चलेगी, कोई नहीं जानता. लेकिन एक चीज़ तय है कि किसान इसे बिना जीते वापस नहीं जाएंगे.

आपको बता दें कि राकेश टिकैत की गिरफ्तारी तक की बातें होने लगी थी. मीडिया द्वारा ऐसा माहौल बना दिया गया था कि राकेश टिकैत को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है और किसान आंदोलन को मोदी सरकार द्वारा खत्म कराया जा सकता है. इन सबके बीच मीडिया के सामने आकर राकेश टिकैत अपनी बात कहते हुए रोने लगे थे और राकेश टिकैत के आंसुओं ने किसान आंदोलन की फिजा बदल कर रख दी थी. गोदी मीडिया के अरमान धरे के धरे रह गए थे.

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