Ravish Kumar social media post

नूपुर शर्मा के बयान के खिलाफ पूरे देश में मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन किया और कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई. हिंसा के मामले में लगातार सरकारें एक्शन ले रही हैं. प्रयागराज में बुलडोजर चलाया जा रहा हैं. कई लोग इस हिंसा को जायज नहीं ठहरा रहे हैं. कई लोगों का कहना है कि जो दूसरे धर्म को संविधान का पाठ पढ़ाते थे वही आज खुद संविधान की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं, इस चीज की आड़ में कि कानून अपना काम नहीं कर रहा है, कानून एक धर्म विशेष के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है.

पूरे देश में हुई हिंसा को लेकर रवीश कुमार (Ravish Kumar) ने अपनी बात रखी है. उन्होंने सोशल मीडिया (Social media) पोस्ट करते हुए लिखा है कि आस्था से आहत के नाम पर आहत की आस्था आफत पैदा करती है, दंगाई बनाती है. भीड़ और उसकी हिंसा का अगर-अगर नहीं होता है. मुसलमान की भीड़ हो या हिंदू की, उसकी हिंसा का कोई धर्म नहीं होता है. पहले या बाद के नाम पर होने वाली हिंसा का कोई तुक नहीं होगा. शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जो हुआ है, उसे नहीं होने देना चाहिए था. नाराजगी और आक्रोश में अंतर होता है.

रवीश कुमार ने आगे लिखा है कि आस्था के नाम पर नाराजगी को आक्रोश में बदलने वाले जानते हैं कि इससे ना तो आस्था बेहतर होती है ना आस्था को बदनाम करने वाले सुधारते हैं. इसके नाम पर हिंसा करने वाले दंगाई ही कहे जाते हैं. जिनके हाथ में पत्थर नजर आ रहे हैं उन्हें और तो कुछ नहीं कहां जाएगा. उनकी हिंसा से उस भीड़ को खुराक मिलेगा जो हर दिन इसी का माहौल बनाती है. इसी के खतरे की आशंका बहुसंख्यक के मन में बिठाती है. इन खुराकु के लेनदेन से कुछ नहीं होगा.

रवीश कुमार ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए लिखा है कि ऐसा करने वाले कानून की हर किताब में और दुनिया की हर किताब में केवल दं,गाई कहे जाएंगे. किसी की प्रक्रिया में हिंसा करने वाला और किसी को हिंसा के लिए उकसाने वाला दंगाई ही होता है, चाहे वह बच जाए या पकड़ा जाए. यूपी ही नहीं देश के कई शहरों में हिंसा की खबरें हैं. जहां से शांति की खबरें हैं वहां भी तनाव की आशंका थी. प्रयागराज में जिनके हाथ में पत्थर हैं वह अच्छी तरह जानते होंगे उन्होंने क्या किया है. उन्होंने खुद जानबूझकर उस बड़ी भीड़ का चारा बना दिया है, जो पत्थरों के नाम पर बनाई जाती रहती है.

रवीश कुमार ने आगे लिखा है कि इस बहुसंख्यक भीड़ को सड़क पर उतरने की जरूरत नहीं है, उसे केवल इस तरह का चारा चाहिए. बाकी का काम गोदी मीडिया सोशल मीडिया और प्रशासन की मदद से कर लेगी. हिंसा की इन तस्वीरों को दिखाकर बड़ी भीड़ पीड़ित पक्ष बनने लगेगी. कहेगी कि हमारी बातें सही हो रही हैं. वह अपराधी से निर्दोष बनने लगेगी. टीवी के स्टूडियो से भीड़ को बड़ा करके बदला ले लेगी. बड़ी भीड़ को छोटी भीड़ का बस इतना ही इस्तेमाल करना है कि अपनी भीड़ को और बड़ी करना है.

रवि कुमार (Ravish Kumar) ने आगे लिखा है कि प्रयागराज के पत्थरबाजों ने बड़ी भीड़ को खुराक दे दिया है. पत्थरबाजी एक सेगमेंट है, जिसके नाम पर मुस्लिम समुदाय को लगातार चिन्हित किया गया, उसे पत्थरबाज के रूप में पेश किया गया. इस पैटर्न पर फिर कभी बात होगी. लेकिन जब प्रयागराज के मुस्लिम युवा पत्थर उठा लेंगे तो उनकी व्याख्या पहले से तैयार इसी फ्रेम में होनी ही होनी है. गलती आपकी है जो आप ने पत्थर उठाया. अब शुरू होगा चुप्पी चुप्पी का खेल. यह चुप्पी, वह चुप्पी के नाम पर बड़ी भीड़ के समर्थक निकलेंगे. रवीश कुमार ने लिखा है कि जब कोर्ट का फैसला आने से पहले घरों पर बुलडोजर चलाया गए तब यही लोग कानून व्यवस्था का श्रेष्ठ उदाहरण बता रहे थे.

उन्होंने आगे लिखा है कि यह क्रिमिनल मानसिकता के लोग हैं, जो इस मौके पर चुप्पी चुप्पी खेलने आते हैं. यह हमेशा ऐसे ही मौके पर बाहर निकलते हैं. टीवी और सोशल मीडिया में हर दिन बातों का पत्थर चला कर यह लोग अपना कानून बना चुके हैं. इनकी चुप्पी का हिसाब देखेंगे तो सबसे ज्यादा इनके खाते से निकलेंग. इसके बाद भी इन बातों का जवाब बातों से ही दिया जा सकता है, पत्थर से नहीं. किसी की कार दुकान खत्म करके नहीं दिया जा सकता है.

रवीश कुमार ने बड़ी बात कहते हुए लिखा है कि बात बस इतनी सी है कि हिंसा में शामिल होकर आप खुद को गोदी मीडिया और पुलिस के लिए चारा बना रहे हैं. याद रखिएगा पुलिस भीड़ हटने के बाद आती है. जब पुलिस आती है तो भीड़ भाग जाती है. जब पत्थर चलाने वाले अकेला होते हैं. वर्षों मुकदमे चलते हैं. पत्थरबाजों हिंसा से केवल उनके घर नहीं जलते अपनों के भी जलते हैंं. लोगों का जीवन तबाह हो जाता है. इस हिंसा से ना बदला ले पाते हैं ना कुछ बदल पाते हैं. मुस्लिम समाज कई तरह के पिछड़ेपन का शिकार है. उसके लिए तो प्रदर्शन नहीं होता. गैरकानूनी ढंग से लोगों के घर बुलडोजर से गिरा दिए गए तब तो कोई प्रदर्शन नहीं हुआ.

रवीश कुमार ने आगे लिखा है कि आस्था आहत के नाम पर एक बार फिर मुसलमान उनकी जाल में फंसने जा रहे हैं. लोकतंत्र में अपने आक्रोश को समझना बहुत जरूरी होता है. इसे फोड़कर या फाड़ कर कुछ हासिल नहीं होता. शुक्रवार की हिंसा के पीछे आस्था और आहत का आक्रोश है तो यह दुख भी है. और बेमतलब भी इसका कोई अंत नहीं है. हिंसा के नाम पर दंगाई ही पैदा होते हैं. कानून का अमल नहीं होता है यह बहस का मुद्दा है. मान लेते हैं कि कानून का अमल नहीं होता तब भी प्रदर्शन कानून के अमल के लिए होगा, कानून के हाथ में लेने के लिए नहीं.

रवीश कुमार ने लिखा है कि हिंदू हो या मुसलमान दोनों को आस्था और आहत की भावुकता के नाम पर उग्रता से बचना चाहिए. सांप्रदायिक हिंसा का यही तो इतिहास है. उसने किया तो हम करेंगे, हमने किया तो वह करेगा. वह गलत है, हम सही हैं. हम सही हैं, वह गलत है. पहले और बाद का कोई हिसाब नहीं रहता. आपके ईगो से भीड़ का ईगो बड़ा होता है. ईगो से हिंसा होती हैै, ईगो से आप दंगाई बन जाते हैं. जिस किसी भीड़ में जितना कम ईगो होगा वह भीड़ उतनी ज्यादा लोकतांत्रिक होगी. उसकी मान्यता उतनी ही अधिक होगी. हो सकता है तब भी हमला हो जाए लेकिन इसकी आशंका से बचने की तैयारी होनी चाहिए ना की लड़ने की.

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