Ravish Kuma News

रवीश कुमार (Ravish Kuma) उन चुनिंदा पत्रकारों में से हैं जो आज भी सरकार की गलत नीतियों को खुलकर जनता के सामने रख रहे हैं. रविश कुमार उन चुनिंदा पत्रकारों में से हैं जो आज भी सरकार के सामने घुटने टेकने की जगह, जनता की आवाज को अपने प्लेटफार्म पर जगह दे रहे हैं. बीजेपी आईटी सेल कई तरह के प्रोपेगेंडा के सहारे रवीश कुमार को बदनाम करने की कोशिश करती रही है. लेकिन वह आज भी बीजेपी की मशीनरी के सामने डटे हुए हैं.

यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को लेकर बीजेपी की तरफ से कई तरह की सफाई पेश की जा रही है, दावे किए जा रहे हैं. वापस लाने को लेकर भी कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. इसको लेकर रवीश कुमार ने सही तथ्यों के सहारे बीजेपी के नेताओं को बीजेपी आईटी सेल को एक्सपोज किया है.

रवीश कुमार ने कहा है कि 2014 में यूक्रेन से हजारों छात्रों को निकालने वाली सरकार 2022 में क्यों भूल गई? उन्होंने आगे कहां है कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान सुन रहा था वह कह रहे थे कि, यूक्रेन के खारकीव शहर में भारतीय हैं, वह किसी भी तरह से शहर छोड़ दें, पैदल ही निकल चलें. जब वह युद्ध में फंसे भारतीयों को पैदल निकल चलने की बात कर रहे थे तो उनकी नजर और जुबान दोनों लड़खड़ा रही थी.

रवीश कुमार ने कहा कि मोदी सरकार का सारा प्रोपेगेंडा इस एक बात से ध्वस्त हो गया कि जब उनकी सरकार अपने नागरिकों को पैदल भागने की एडवाइजरी जारी कर रही थी. यानी सरकार ने छात्रों पर ही छोड़ दिया कि युद्ध के सारे खतरे वही उठाएं और हम गोदी मीडिया लगाकर देश में मोदी मोदी कर लेंगे. लोगों को भरमा देंगे कि सब सरकार कर रही है. यहां ध्यान रहे कि सरकार ने छात्रों को यूक्रेन से नहीं निकाला है. जब वह खुद निकल कर आए हैं तब सरकार उन्हें दूसरे देशों से लेकर भारत आई है.

प्रधानमंत्री मोदी को लेकर रवीश कुमार ने लिखा है कि, यूक्रेन संकट के समय प्रधानमंत्री मोदी की हालत उस छात्र की तरह दिखी जो क्लास में टीचर के आते ही झट से सर झुका कर पढ़ने का नाटक करने लगता है. वह कॉपी में लिखता नहीं है लेकिन हाथ आगे कर लिखने का नाटक करता है. ठीक वही काम हमारे प्रधानमंत्री करते हैं. दिनभर बलिया, जौनपुर करने के बाद शाम की बैठक का वीडियो आता है.

रवीश कुमार ने आगे कहा है कि आप याद करें कि युद्ध होने के बाद हजारों छात्रों को प्रधानमंत्री भी ट्रोल करने लगे, जब उन्होंने कह दिया कि छात्र छोटे देशों में पढ़ने क्यों जाते हैं. जब छात्र जान बचाने के लिए गुहार लगा रहे थे तब यह कहने का वक्त नहीं था. आईटी सेल लगाकर छात्रों को गालियां दिलवाई गई कि अपने पैसे से टिकट क्यों नहीं खरीदा. जमीन पर वास्तविकता क्या होती है और प्रचार प्रोपेगेंडा क्या होता है, हजारों भारतीय छात्रों और उनके मां-बाप ने देख लिया होगा.

रवीश कुमार ने आगे कहा है कि इस बार छात्रों ने सरकार से मुफ्त टिकट नहीं मांगे थे. यह प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है. लेकिन आईटी सेल खुद इसकी जाल में फस गया. उसके सामने यह तथ्य है रख दीजिए कि जून 2014 में भारत सरकार ने 1000 छात्रों का टिकट कटाया था, खुद से पहल की थी. तो इस बार क्यों नहीं की गई?

रवीश ने आगे कहां है कि, कितनी बार बताएं कि 15 फरवरी को जो पहली बार एडवाइजरी आई थी उसमें यही लिखा था कि छात्र अस्थाई तौर पर यूक्रेन छोड़ने पर विचार कर सकते हैं. इसके उलट 2014 की एडवाइजरी में साफ-साफ लिखा होता था और सरकार ने टिकट देकर छात्रों को यूक्रेन से निकाला था. इस बार सरकार सोती हुई पकड़ी गई.

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