Uddhav Thackeray

महाराष्ट्र में सियासी घमासान लगातार जारी है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने सोशल मीडिया के जरिए महाराष्ट्र की जनता से संवाद भी स्थापित किया. ठाकरे ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से मीडिया के जरिए कुछ बातें सामने आ रही हैं, बालासाहेब की सूचना है या नहीं? मुख्यमंत्री मिलते ही नहीं. यह सब सवाल उठाए जा रहे हैं. पिछले कुछ दिनों में मैं मिल नहीं रहा था यह बात सच है. और भी बहुत कुछ कहा उद्धव ठाकरे ने.

लेकिन अब आगे क्या होगा? एकनाथ शिंदे को दल बदल कानून से बचते हुए उद्धव ठाकरे की सरकार गिराने के लिए शिवसेना के 37 विधायक चाहिए. फिर भी वह रुके नहीं रहे. वह बागियों के डेरे में लगातार शिवसेना विधायकों को जोड़ते जा रहे हैं. गुवाहाटी के पांच सितारा होटल के बाहर शिंदे 46 विधायक साथ होने का दावा कर रहे हैं. लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि बागियों की तादात 50 तक जा सकती है.

सवाल सबसे बड़ा यही है कि आखिर एकनाथ शिंदे चाहते क्या हैं? वह लगातार जरूरत से ज्यादा शिवसेना के बागी विधायकों को क्यों जोड़ रहे हैं? उधर बीजेपी ने अब तक विधानसभा सत्र बुलाने की मांग क्यों नहीं की है? उद्धव से खुली बगावत के बावजूद शिंदे लगातार क्यों कह रहे हैं कि वह बाला साहब के सच्चे शिवसैनिक हैं और उन्होंने शिवसेना नहीं छोड़ी है?

इन सभी सवालों का एक ही जवाब लग रहा है, एकनाथ शिंदे का मिशन सिर्फ उद्धव ठाकरे की कुर्सी छीनना नहीं है, बल्कि शिवसेना छीनना भी है. लेकिन यह होगा कैसे? कानूनी तौर पर राजनीतिक पार्टियों में बटवारा दो हालात में होता है. पहला जब संसद या विधानसभा सत्र में हो यानी उनकी बैठक चल रही हो. दूसरा जब संसद या विधानसभा सत्र में ना हो. पहली परिस्थिति में, यानी जब संसद या विधानसभा सत्र में होती है तो किसी भी पार्टी के विधायकों के बीच होने वाले बंटवारे को पार्टी में बटवारा माना जाता है. ऐसे में बंटवारे पर ही दल बदल कानून लागू होता है.

सीधे-सीधे कहा जाए तो दल बदल कानून लागू करने के लिए संसद या विधानसभा क्षेत्र में होना जरूरी है. ऐसे हालात में गेंद विधानसभा के स्पीकर के हाथों में चली जाती है. दूसरे तरह के हालात में जब संसद या विधानसभा सत्र में नहीं होती तब किसी भी पार्टी में होने वाला बंटवारा संसद या विधानसभा से बाहर का बंटवारा माना जाता है. ऐसे में अगर पार्टी के चुनाव चिन्ह पर कोई खेमा दावा करता है, यानी जब यह तय होना होता है कि कौन सा खेमा असली पार्टी है, तब इन पर सिंबल्स ऑर्डर 1968 लागू होता है सिंबल्स ऑर्डर 1968 के तहत सिर्फ चुनाव आयोग फैसला करता है.

पिछले कुछ घंटों में की गई बयानबाजी का मतलब?

पिछले कुछ घंटों में एकनाथ शिंदे ने कई तरह के बयान दिए हैं. उन्होंने कहा है कि हम बाला साहब के पक्के शिवसैनिक है. हम बाला साहब के हिंदुत्व को आगे बढ़ाएंगे. बाला साहब के विचारों और धर्मवीर आनंद दिघे साहब की शिक्षाओं के रास्ते पर चलते हुए सत्ता के लिए हमने कभी धोखा नहीं दिया और ना कभी धोखा देंगे. उन्होंने कहा कि शिवसेना को ना छोड़ा है और ना छोड़ेंगे. हम बाला साहब ठाकरे के हिंदुत्व का पालन कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे.

इसके अलावा एकनाथ शिंदे ने कहा है कि हिंदुत्व से समझौता नहीं होगा. सच्चा शिवसैनिक हूं. सत्ता के लिए हिंदुत्व से समझौता नहीं कर सकता हूं. यह बयान उन्होंने गुवाहाटी पहुंचने पर दिया.

इसके अलावा बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि बाला साहब ने सोचा नहीं होगा हनुमान चालीसा पढ़ना देशद्रोह होगा. क्या बाला साहब ठाकरे ने कभी सोचा होगा कि उनके बेटे के शासनकाल में हनुमान चालीसा पढ़ना देशद्रोह होगा और औरंगजेब की कब्र पर जाना राजकीय शिष्टाचार होगा? उन्होंने कहा कि शिवसेना हिंदुत्व की विचारधारा को त्याग कर वोट बैंक की राजनीति पर उतर आई है. अब यह शिवसेना बालासाहेब ठाकरे वाली शिवसेना नहीं रही, बल्कि वोट बैंक की राजनीति करने वाली उद्धव ठाकरे की शिवसेना है.

इन सभी बातों से यह साफ हो रहा है कि शिंदे का निशाना सिर्फ उद्धव ठाकरे की कुर्सी नहीं, बल्कि शिवसेना को हथियाना है. शिंदे लगातार बागी विधायकों की संख्या बढ़ाकर शिवसेना पर दावा ठोंक सकते हैं. गेंद चुनाव आयोग के पाले में रहे इसलिए बीजेपी विधानसभा सत्र बुलाने की मांग नहीं कर रही है. असली शिवसैनिक जैसे बयान देकर शिंदे दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने पार्टी से बगावत नहीं की और असली शिवसेना वही हैं.

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