Prime Minister Narendra Modi UP

मीडिया के जरिए और बीजेपी के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की लोकप्रियता को लेकर तमाम तरह के दावे किए जाते हैं, आंकड़े और सर्वे भी दिखाए जाते हैं, जिनकी विश्वसनीयता पर हमेशा सवाल उठते हैं. कहा जाता है कि दुनिया भर में मोदी का डंका बजता है. अगर सच में दुनिया भर में मोदी का डंका बजता है तो होना तो यही चाहिए था कि, बनारस में उनके गए बगैर भी लोग सारे वोट बीजेपी की झोली में डाल देते और बाकियों की जमानत जप्त करा डालते.

सिर्फ बनारस ही क्यों अगर दुनिया में डंका बजता है तो फिर अपने देश के किसी भी राज्य में, चाहे वह गुजरात हो, उत्तर प्रदेश हो और उत्तराखंड हो, महाराष्ट्र हो, गोवा हो या कोई दूसरा राज्य हो, मोदी के नाम पर ही लोगों को बीजेपी की सरकार बनवा देनी चाहिए. ताकि किसी भी राज्य में जाकर यह बोलने की नौबत ना आए कि मैं इस राज्य का बेटा हूं या मेरा यहां से पुराना रिश्ता है.

गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था “मैं ही गुजरात हूं”, “मैं ही विकास हूं”. 2017 में प्रधानमंत्री मोदी को “गुजरात गौरव” यात्रा के समापन पर यह बयान इसलिए देना पड़ा, क्योंकि कांग्रेस के कैंपेन “विकास पागल है” ने बीजेपी के छक्के छुड़ा दिए थे. हालात यह हो गए थे कि जैसे तैसे बीजेपी सत्ता में वापसी कर सकी. गुजरात में ऐसा करने की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी. क्योंकि जिस व्यक्ति का डंका पूरे विश्व में बजता है वह लंबे समय तक गुजरात का मुख्यमंत्री रह चुका था.

उत्तर प्रदेश में भी यही अपेक्षा होनी चाहिए थी. बनारस के बारे में तो ऐसा सोचना भी बेमानी लगता है, वहां प्रधानमंत्री मोदी को जाना ही नहीं चाहिए था, अगर पूरे विश्व में डंका बजता है तो.

लेकिन सवाल यह है कि क्या सच प्रधानमंत्री मोदी को पता चल चुका है? शायद सच होता ही ऐसा है, बिल्कुल ऐसा ही होता है. तभी तो जिसे मां गंगा ने काशी में चुनाव लड़ने के लिए बुलाया हो, जो दो-दो बार अपना चुनाव अच्छे मार्जिन से अपनी लोकसभा सीट से जीत चुका हो, वह अपने ही कुछ निकम्मे के चलते गली-गली घूम कर खाक छानने को मजबूत नजर आया.

बनारस के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को अयोध्या के राम मंदिर निर्माण के बराबर का काम बता कर बीजेपी पूरे यूपी में वोट मांग रही थी. लेकिन बनारस में अपनी जीती हुई सीटें निकालना ही क्यों मुश्किल होने लगा?

उत्तर प्रदेश में एक दफा तो ऐसा लगा खासतौर पर बनारस में कि, प्रधानमंत्री मोदी को बीजेपी के लिए बंगाल से भी ज्यादा मेहनत बनारस में करनी पड़ी. वह भी तब जबकि अखिलेश यादव के बुलावे पर वाराणसी पहुंची ममता बनर्जी की वजह से कोई असर नहीं महसूस किया गया. प्रधानमंत्री मोदी बनारस के एक छोर से दूसरी, तीसरी और हर छोर तक खुद ही पहुंच गए. आखिरी दौर में तो ऐसा लगा जैसे हर जगह मोदी ही मोदी नजर आ रहे हो.

पिछले कई दिनों से बनारस में यह चर्चा सरेआम होने लगी थी कि बीजेपी के हिस्से की शहर दक्षिणी सीट तो फस चुकी है और योगी सरकार के मंत्री और बीजेपी उम्मीदवार नीलकंठ तिवारी के माफीनामा ने तो कंफर्म ही कर दिया था. 2017 से 2022 तक यानी 5 साल तक उत्तर प्रदेश में डबल इंजन की सरकार चलाने के बाद भी बीजेपी नेतृत्व को संघ से बिल्कुल वही संदेश मिला जो 2017 में मिला था, सीट बचानी है तो मोदी को मोर्चे पर लाओ वरना बाजी हाथ से निकल जाएगी.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस व्यक्ति का डंका पूरे विश्व में बज रहा है, वह बनारस की गलियों में खाक छान रहा है. आखिर क्यों? जिस डबल इंजन की सरकार के नाम पर बीजेपी नेतृत्व पूरे देश में वोट मांगता है, आखिर चुनाव में यह हाल क्यों हो जाता है? 2017 में यही हाल गुजरात में देखने को मिला था, 2020 में बिहार में भी ऐसी स्थिति बन गई थी.

महाराष्ट्र में तो बीजेपी शिवसेना गठबंधन के साथ लड़ी थी, लेकिन इतनी सीटें भी नहीं आ पाई कि राजनीतिक विरोधियों के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल हो. हरियाणा में तो डबल इंजन की सरकार दूसरी बार बनाने के लिए ना जाने कितने पापड़ बेलने पड़े.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिक्चर से गायब क्यों हैं?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर सबसे अधिक ताज्जुब होता है कि, महीने में कई बार बनारस का दौरा करने वाले योगी पिक्चर से गायब क्यों हैं? योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर सदर सीट पर 3 मार्च को वोट डाले गए थे और तब से आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी तक प्रधानमंत्री मोदी बनारस में डटे रहे, लेकिन योगी आदित्यनाथ नजर नहीं आए, क्यों?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आखिरी चरण की लड़ाई निर्णायक साबित होने वाली है और पूर्वांचल का मुख्य केंद्र होने की वजह से बनारस से मोदी अपना चौतरफा प्रभाव दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन क्या योगी आदित्यनाथ को लोगों की नजर से हटाने की जानबूझकर कोशिश हो सकती है? क्या योगी आदित्यनाथ को थोड़ा दूर रखकर अमित शाह सत्ता विरोधी लहर को काउंटर करने की खास रणनीति पर काम कर रहे थे?

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