Ravish Kumar maharashtra politics

महाराष्ट्र के अंदर सरकार बचेगी या जाएगी यह अभी बता पाना बिल्कुल आसान नहीं है. महाराष्ट्र में उठापटक लगातार जारी है. उद्धव ठाकरे ने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई है. एकनाथ शिंदे लगातार दावा कर रहे हैं कि आधी से अधिक शिवसेना और उसके विधायक उद्धव ठाकरे के खिलाफ उनके साथ खड़े हैं. आने वाले कुछ घंटों में या दिनों में पता चलेगा कि महाराष्ट्र में क्या होगा.

इस बीच आपको बता दें कि शिवसेना के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद संजय रावत ने महाराष्ट्र विधानसभा भंग होने के संकेत दिए हैं. उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि, विधानसभा भंग होने की ओर बढ़ रहा है सियासी संकट.

इन सबके बीच वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार (Ravish Kumar) ने जो कहा है उसे सोचने और समझने की जरूरत है. रवीश ने महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक उथल-पुथल पर बड़ी बात कही है. उन्होंने कहा है कि बीजेपी ने कई राजनीतिक दलों को खत्म किए हैं. चुनाव में हराकर नहीं, बल्कि जिससे हारी है उसमें तोड़फोड़ मचा कर और जांच एजेंसियां लगाकर. बीजेपी कहेगी ही कि उसने ऐसा नहीं किया. कानून अपना काम कर रहा था और विधायक अपने आप पुराने दल छोड़ कर आ रहे थे.

रवीश कुमार ने आगे कहा है कि शिवसेना को ध्वस्त कर देना बड़ी राजनीतिक घटना है. इस पार्टी को गुमान था कि उसके पास भी निष्ठावान नेता और कार्यकर्ता है. इसी दम पर शिवसेना शक्ति प्रदर्शन करती थी. अब उसी सेना के विधायक पार्टी से बगावत कर चुके हैं. इन्हें जाना तो बीजेपी में ही है क्योंकि एकनाथ शिंदे की शर्त है कि शिवसेना बीजेपी के साथ सरकार बनाएं. शिवसेना ने हिंदुत्व छोड़ दिया है. किसी को भी लग सकता है कि यह रास्ता किसके लिए बनाया गया है.

रवीश कुमार ने कहा है कि चुनाव में क्या होगा, शिवसेना वापसी करेगी या नहीं कोई नहीं जानता. तब तक कितने नेता जेल में होंगे या जांच एजेंसियों के कारण हार मान चुके होंगे, पता नहीं. आज के दौर में दूसरी पार्टी में कोई नेता कब तक रहेगा बीजेपी तय करती है. विपक्ष इसलिए नहीं दिखता है. उसे ध्वस्त किया जा चुका है. बाकी जो बचा है वह एक खाली दफ्तर से या खाली होने वाले किराए के मकान से ज्यादा कुछ नहीं है.

रवीश कुमार ने कहा है कि आप इसे खाली खोखा भी कह सकते हैं. गोदी मीडिया और जांच एजेंसियों के अलावा दूसरे दलों में बैठे सत्ता के लालची नेताओं ने भी इस काम को आसान कर दिया है. जनता को विपक्ष के बिना लोकतंत्र की आदत पड़ती जा रही है.

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