BJP In UP

पिछली बार जब शमशान कब्रिस्तान जैसे मुद्दों पर सवार होकर बीजेपी ने उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव जीता था उसके बाद बीजेपी की अंदरूनी राजनीति अगले कुछ दिनों तक किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म से कम नहीं थी. चारों तरफ यही सवाल था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर सहमति थी, लेकिन अचानक से घोषणा हुई योगी आदित्यनाथ के नाम की और नारे लगने लगे “यूपी में रहना है तो योगी योगी कहना होगा”. हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि दी गई.

बीजेपी अगर उत्तर प्रदेश का चुनाव जीत जाती है तो क्या नेतृत्व को लेकर कोई बड़ा बदलाव हो सकता है? प्रधानमंत्री मोदी ने रैलियों और जनसभाओं में बार-बार इस बात का ऐलान किया है, “आएगा तो योगी ही”. फिर भी बहुत से सवाल हवा में तैर रहे हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में योगी आदित्यनाथ का नाम नहीं था. इन सबके बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया और फिर इस बात को लेकर कोई बड़ा विरोध इन 5 वर्षों में नहीं देखने को मिला.

अब जब योगी आदित्यनाथ खुद मुख्यमंत्री हैं और अगर दोबारा बीजेपी चुनाव जीत जाती है तो उनके कुर्सी संभालने पर अनिश्चय क्यों है? जबकि इस बार बीजेपी ने औपचारिक तौर पर उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है, वह स्टार प्रचारक हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर जातिवादी राजनीति के आरोपों के बावजूद पार्टी ने चेहरा बदलने की हिम्मत नहीं दिखाई.

पिछले कुछ ही महीनों में बीजेपी ने उत्तराखंड में दो बार, कर्नाटक में एक बार और गुजरात में तो पूरे मंत्रिमंडल को ही बदल दिया. लेकिन उत्तर प्रदेश को नहीं छेड़ा. योगी आदित्यनाथ इस बार पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. उनके प्रतिद्वंदी अखिलेश यादव भी पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषक योगी आदित्यनाथ को बीजेपी या फिर संघ परिवार का सदस्य नहीं मानते. वह उन्हें गोरखपुर पीठ के महंत और हिंदू युवा वाहिनी के चेहरे के तौर पर देखते हैं. इसके मायने यह है कि योगी आदित्यनाथ बीजेपी के अनुशासन में चलने वाले नेता के तौर पर नहीं देखे जाते हैं. यह आशंका भी जताई जाती है कि यदि बीजेपी का नेतृत्व उनके खिलाफ कोई कदम उठाने की हिम्मत दिखाता है तो वह अपना अलग रास्ता चुन सकते हैं. कुछ लोग इसे उनके नेतृत्व की ताकत और लोकप्रियता से जोड़ते हैं या फिर कुछ इसमें अनुशासनहीनता की आशंका देखते हैं.

पिछले 5 साल का दौर

योगी आदित्यनाथ खुद कहते हैं कि दीक्षा लेने के बाद उन्होंने जाति की पहचान ही नहीं बल्कि अपना परिवार भी छोड़ दिया. बहुत से लोग उनपर जातिवादी राजनीति या फिर ठाकुरवाद अपनाने का आरोप लगाते रहे हैं. योगी आदित्यनाथ की इस राजनीति से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग उनसे नाराज बताया जाता है. इसके अलावा बीजेपी या उसके वोटर में एक बड़े तबके के अंदर इस बात को लेकर नाराजगी है किकी, पिछला चुनाव केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में लड़ा गया है, जिसका मतलब था कि वही मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन उनके बजाय एक सवर्ण और कट्टर हिंदू नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया.

योगी आदित्यनाथ के खिलाफ नाराजगी तो उस वक्त भी दिखाई दी थी जब 100 से भी अधिक बीजेपी विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर दिया था. मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ ने हिंदुत्व का एजेंडा चलाया तो साथ में ही कानून व्यवस्था मजबूत करने की अपनी छवि बनाई. लेकिन कानून व्यवस्था को लेकर सवाल दूसरी सरकारों से अधिक उठे.

बीजेपी को स्पष्ट बहुमत तभी होगी योगी की वापसी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अंदर बीजेपी समाजवादी पार्टी के गठबंधन से काफी पीछे नजर आ रही है ऐसा राजनीतिक विश्लेषक बता रहे हैं और इसकी संभावनाएं बीजेपी के अंदर भी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिरी के चरण में बीजेपी को बढ़त दिलाने के लिए अपने संसदीय क्षेत्र बनारस में रोड शो कर रहे हैं. योगी आदित्यनाथ सरकार बनाने के दावे कर रहे हैं. लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या बीजेपी स्पष्ट बहुमत से इस बार सरकार बनाएगी? अगर स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो क्या योगी के नाम पर सहमति बन पाएगी?

इसके अलावा भी एक सवाल है, पिछले 20 साल में तो उत्तर प्रदेश में किसी पार्टी की सरकार है रिपीट नहीं हुई है और अब गठबंधन सरकार बने भी उत्तर प्रदेश में जमाना बीत गया है. योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं इससे जरूरी सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश में फिर बीजेपी की सरकार बनेगी? बीजेपी की स्पष्ट बहुमत से जीत यानी योगी की वापसी. क्या मोदी है तो मुमकिन है का नारा यहां जादू दिखाएगा?

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