PM Modi 76 Independence Day
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भारत की आजदी को 75 साल पूरे हो गए हैं और आज देश 76 वां स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) मना रहा है इस मौके पर देशभर में तिरंगा फहराया जा रहा है और लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से सुबह 7:30 बजे तिरंगा फहराया. लाल किले से लोगों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारे देशवासियों ने उपलब्धियां हासिल की हैं, पुरुषार्थ किया है, हार नहीं मानी है और संकल्प को ओझल नहीं होने दिया है. उन्होंने कहा कि हमारे देश के भीतर कितना बड़ा सामर्थ है, एक तिरंगे झंडे ने दिखा दिया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत लोकतंत्र की जननी है. भारत ने साबित कर दिया है कि उसके पास एक अनमोल क्षमता है और अपनी 75 साल की यात्रा के दौरान देश ने कई चुनौतियों का सामना किया है. चाहे वह आजादी की लड़ाई लड़ने वाले हो या राष्ट्र निर्माण करने वाले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, नेहरू जी, सरदार पटेल, एसपी मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री, दीनदयाल उपाध्याय, जेपी नारायण, राम मनोहर लोहिया, नानाजी देशमुख, सुब्रमण्यम भारती. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आजादी के इतने दशकों के बाद पूरे विश्व का भारत की तरफ देखने का नजरिया बदल चुका है. विश्व भारत की तरफ गर्व और अपेक्षा से देख रहा है. दुनिया समस्याओं का समाधान भारत की धरती पर खोजने लगी है.

आज देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है पूरे देश में हर्षोल्लास दिखाई दे रहा है लेकिन इन सबके बीच देश के अंदर से कुछ सवाल उठ रहे हैं उसमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि कहीं हम आजादी तो खोते नहीं जा रहे हैं? देखा जाए तो आज स्वतंत्रता का दिन है, लेकिन आज भाव स्वतंत्रता का दिखाई नहीं देता. चारों तरफ से लोग दबाए जा रहे हैं. आज प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बहुत सारी बातें की. नारी के सम्मान की भी बातें की. लेकिन क्या उनकी पार्टी ने इन बातों पर अमल किया है? क्या उन्होंने खुद राजनीतिक रैलियों में अपनी आज कही गई बातों पर अमल किया है?

स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में अनिवार्य उपस्थिति का आदेश, अपने घर पर तिरंगा लगाकर उसकी फोटो भेजने का आदेश, जबरन सबको सरकारी तिरंगा खरीदने का हुक्म, बिना पूछे सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह से तिरंगा शुल्क काट लेना, जो घर तिरंगा न लगाएं उसकी तस्वीर खींचने के लिए पड़ोसियों को उकसाना, एक निगाह का एहसास जो आप कोई राष्ट्रवाद को ताड़ रही है. असल भाव यहां जबरदस्ती का दिखाई दे रहा है.

और जो भाव दिखाई दे रहा है वह हिंसा के अलावा कुछ नहीं और यह तिरंगे की आड़ में किया जा रहा है, ताकि लोग ना इसे समझ पाए और ना इसका विरोध कर पाए. लेकिन यह तो गांधी ने कहा था जिसका नाम शायद आज सबसे ज्यादा लिया जाए कि, गीता उन्हें प्रिय है लेकिन अगर कोई उनकी कनपटी पर बंदूक रखकर गीता पढ़ने को कहें तो वह ऐसा करने से इंकार कर देंगे. जब सरकार आपको आपका प्रिय काम करने के लिए आदेश देने लगे तो पहला कर्तव्य उससे इनकार करने का है.

यह छल पूर्ण नियंत्रण हमने इस सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही देखना शुरू कर दिया था. 2 अक्टूबर और गांधी की आड़ में जब सरकार ने संस्थानों को स्वच्छता दिवस मनाने का आदेश दिया. हमने अधिकारियों को, अध्यापकों को और तमाम लोगों को भी झाड़ू लेकर सफाई का नाटक करते हुए देखा. योग दिवस योग्य का राजकीय नाटक पूरे देश में सबने किया. स्वाधीनता दिवस का पहला संदेश है अपनी स्वतंत्रता की हर कीमत पर रक्षा करना और दूसरों की स्वतंत्रता के लिए भी कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार रहना. स्वतंत्रता का भाव न्याय और समानता के भाव से अनिवार्य रूप से जुड़ा है. क्या आज का तिरंगा हमारे भीतर इन भावों को जगा पा रहा है, जिसके लिए आदेश दिया गया है वह भी सरकारी?

जब आप की सरकार आप को अपने अधिकारों की बात करने के लिए लज्जित करने लगे और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य के नाम पर उन अधिकारों का अपहरण कर ले तो आपका अधिकार सिर्फ तिरंगा फहराने का रह जाता है. आज का दिन सबके लिए अपनी यानी सबकी आजादी सुनिश्चित करने के संघर्ष में अपनी भूमिका तय करने का दिन होना चाहिए. आजादी का मतलब है अपना हक, दूसरों का हक.

वह दलित बच्चा जो स्कूल के मटके से पानी पीने के चलते आज इस दुनिया में नहीं है, उसके अधिकार के लिए क्या सिर्फ दलित समाज को सड़क पर होना चाहिए? क्या आफरीन फातिमा के लिए, जिसकी मां का घर इलाहाबाद में बुलडोजर से गिरा दिया गया, सिर्फ आफरीन फातिमा अदालत में खड़ी होगी? ऐसे ही तमाम मामलों में जिनके ऊपर अत्याचार हुआ है क्या सिर्फ वही लोग उसके लिए आवाज उठाएंगे? जो दूसरों के लिए आवाज उठाने के चलते आज हिंदुस्तान की जेलों में है, क्या आज हम उनकी आजादी के बारे में सोचने के लिए 2 मिनट भी निकाल पाएंगे?

महात्मा गांधी ने कहा है, नागरिक आजादी स्वराज की तरफ पहला कदम है. यह राजनीतिक और सामाजिक जीवन की प्राणवायु है. यह आजादी की बुनियाद है. इसमें किसी भी प्रकार के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है. हमें आज तिरंगा फहराते हुए यह सवाल जरूर करना चाहिए खुद से कि कहीं हमने आजादी की बुनियाद ही तो नहीं खोद डाली है, कहीं हमने नागरिक अधिकारों के सवाल पर समझौता तो नहीं कर लिया है?

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